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ऐतिहासिक बड़कागढ़ ठाकुर निवास में 146 वर्षों की परंपरा: वैदिक-तांत्रिक विधि से संपन्न हुआ माँ भगवती का अलौकिक महाष्टमी हवन

जगन्नाथपुर: ऐतिहासिक ठाकुर निवास बड़कागढ़ में पिछले 146 वर्षों से चली आ रही माँ भगवती की महाष्टमी हवन पूजा इस वर्ष भी पूरी दिव्यता, आस्था और श्रद्धा के साथ संपन्न हुई। अपनी अनूठी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध बड़कागढ़ का यह दिव्य हवन अनुष्ठान पूरे क्षेत्र में अनोखा और अलौकिक माना जाता है।

वैदिक और तांत्रिक विधियों का अद्भुत संगम

बड़कागढ़ दुर्गा पूजा के दौरान आयोजित होने वाला यह महाहवन पूरी तरह से तांत्रिक और वैदिक रीति-रिवाजों के अद्भुत मेल से किया जाता है। इस विशेष पूजा में राजपरिवार के सदस्य मुख्य यजमान के रूप में बैठते हैं। पुरोहित परम पूज्य श्री सदन गोपाल शर्मा के सानिध्य में, पूरी तन्मयता और शुद्ध मंत्रोच्चारण के साथ इस भव्य तंत्र-वैदिक अनुष्ठान को संपन्न कराया गया।

तीन दिनों तक अखंड प्रज्वलित रहता है हवन कुंड

इस पूजा की सबसे बड़ी विशेषता इसका विशेष रूप से तैयार किया गया हवन कुंड है। तांत्रिक पद्धति से निर्मित यह कुंड 4 फीट गहरा और 3 फीट चौड़ा होता है, जिसे सफेद, हरे, काले और लाल रंग की पताकाओं (ध्वज) से सुशोभित किया जाता है।
महाष्टमी के दिन प्रज्वलित होने वाली यह पावन अग्नि महादशमी तक लगातार तीन दिनों तक अखंड रूप से जलती रहती है। अग्नि को निरंतर प्रज्वलित रखने के लिए केवल आम की लकड़ी और शुद्ध घी का ही उपयोग किया जाता है।

विशेष सामग्री और महाभोग

इस महाहवन के लिए एक विशेष मिश्रण तैयार किया जाता है, जिसमें मुख्य रूप से चावल, जौ, तिल, गुड़, घी, मधु (शहद) और बेलपत्र शामिल होते हैं। वहीं माँ भगवती को प्रसन्न करने के लिए गढ़ी (सूखा नारियल), गुड़, बताशा, इलायचीदाना, काजू, किशमिश और छुहारा का भव्य भोग लगाया गया। भोग के उपरांत उपस्थित भक्तों द्वारा माँ भगवती से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हुए मंगल आरती की गई।

बिना किसी आडंबर के अटूट श्रद्धा

सन 1880 ईस्वी से निरंतर चली आ रही इस ऐतिहासिक पूजा की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह आज के आधुनिक दौर में भी बिना किसी तड़क-भड़क, दिखावे या आडंबर के पूरी सादगी और शुद्धता के साथ संपन्न होती है।

कल सुबह होगी संधि बलि और महानवमी का प्रवेश

परंपरा के अनुसार, महाष्टमी के पावन अवसर पर माँ भगवती चिंतामणि और नवपत्रिका देवी उपवास पर हैं। दिनांक 19 को प्रातः 5:30 बजे से महाष्टमी की मुख्य पूजा का शुभारंभ होगा। इसके बाद, प्रातः 7:53 बजे अत्यंत महत्वपूर्ण ‘संधि बलि’ दी जाएगी, जिसके तुरंत बाद महानवमी तिथि का आगमन हो जाएगा।

इस तीन दिवसीय महाअनुष्ठान का समापन विजयादशमी (महादशमी) को माँ भगवती चिंतामणि की विशेष पूजा और हवन विसर्जन के साथ होगा। विसर्जन के उपरांत सभी भक्तों को कल्याणकारी भभूत (विभूति) का आशीर्वाद लगाया जाएगा, ताकि माँ भगवती की कृपा और सुख-समृद्धि हर घर में बनी रहे।

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