खासमहल मैन्युअल के संशोधन तक दंडात्मक कार्रवाई पर तुरंत लगे रोक: विधायिका व कार्यपालिका की नाकामी का शिकार हो रही जनता -अम्बा प्रसाद
Ranchi: झारखण्ड राज्य गठन के ढाई दशक बीत जाने के बाद भी खासमहल भूमि नीति को लेकर अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। राज्य गठन से लेकर अब तक न तो खासमहल मैन्युअल का नवीकरण किया गया है और न ही वर्षों से रह रहे खासमहल पट्टेदारों के लीज का नवीकरण हुआ है। इस विधायिका और प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण राज्य भर में पट्टाधारकों के बीच गहरा असंतोष व्याप्त है।
वर्तमान में उपजी यह विवादास्पद स्थिति विधायिका और कार्यपालिका के बीच गंभीर समन्वयहीनता और प्रशासनिक अराजकता को उजागर करती है। एक ओर जहाँ नीतिगत स्पष्टता के अभाव में नीति-निर्माण की प्रक्रिया थमी हुई है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन द्वारा बिना किसी स्पष्ट नियमावली के एकतरफा और दंडात्मक कदम उठाए जा रहे हैं।
बिना किसी पारदर्शी और सम्यक प्रक्रिया के कुछ चुनिंदा पट्टेदारों के खिलाफ की जा रही प्रशासनिक कार्रवाइयों ने राज्य में हिटलरी और तुगलकी रवैये जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी है। प्रशासन के इस कड़े और मनमाने रुख के कारण आम जनता लगातार प्रताड़ित हो रही है, वहीं नागरिकों के अधिकारों और जनहित के लिए आवाज उठाने वाले जनप्रतिनिधियों को भी निशाना बनाया जा रहा है।
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए सरकार से पुरजोर आग्रह करती हूँ कि वह मामले में अविलंब हस्तक्षेप करे और खासमहल मैन्युअल का तुरंत नवीकरण कर लीज विस्तार की प्रक्रिया को पारदर्शी व सरल बनाया जाए, तथा जब तक विधिसम्मत नीति लागू नहीं होती, तब तक पट्टेदारों के खिलाफ जारी तमाम अन्यायपूर्ण प्रशासनिक कार्रवाइयों पर तुरंत रोक लगाई जाए एवम यथास्थिति बनाए रखा जाए ।