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सम्राट हर्षवर्धन जयंती: भाग्य नहीं, पौरुष और पुरुषार्थ से इतिहास लिखने वाले महान दानवीर को नमन

प्रयाग के ऐतिहासिक ‘कुंभ मेले’ की शुरुआत करने वाले, महान क्षत्रिय योद्धा और पुष्यभूति राजवंश के परमभट्टारक नरेश सम्राट हर्षवर्धन बैस की जयंती पर पूरा देश उन्हें सादर नमन कर रहा है। वह एक ऐसे प्रतापी शासक थे जिन्होंने विषम परिस्थितियों में भी अपने पुरुषार्थ के बल पर पूरे उत्तर भारत को एक सूत्र में पिरोया और इतिहास की धारा को बदल दिया।

अपशगुन को शगुन में बदलने वाला महायोद्धा

सम्राट हर्षवर्धन के राजकवि बाणभट्ट ने ऐतिहासिक ग्रंथ ‘हर्षचरित’ में एक बेहद प्रेरणादायक घटना का उल्लेख किया है। जब राजपुत्र हर्षवर्धन अपनी दिग्विजय यात्रा शुरू करने के लिए सेना एकत्र कर चुके थे, तब उन्हें राजवंश की शाही मोहर प्रदान की गई। मोहर ग्रहण करते समय अचानक वह सम्राट के हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गई।

उस दौर में दिग्विजय यात्रा की शुरुआत में ऐसा होना एक बहुत बड़ा अपशगुन माना जाता था। कोई भी सामान्य या भाग्यवादी राजा होता तो वह भयवश अपनी यात्रा को वहीं स्थगित कर देता। परंतु, सम्राट हर्षवर्धन भाग्यवादी नहीं बल्कि घोर पुरुषार्थवादी थे।

प्रतिशोध और अखंड भारत का संकल्प

हर्षवर्धन के लिए उनके बड़े भाई राज्यवर्धन और बहनोई ग्रहवर्मन की छल से की गई हत्या का बदला लेना और मातृभूमि की रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म था। उन्होंने इस कथित अपशगुन की चिंता न करते हुए अपनी दिग्विजय यात्रा जारी रखी। उन्होंने न केवल अपने शत्रुओं का समूल नाश किया, बल्कि पूरे उत्तर भारत को पुष्यभूति राजवंश के अधीन लाकर एक मजबूत साम्राज्य की स्थापना की।

इस घटना पर राजकवि बाणभट्ट ने बाद में बहुत सुंदर विश्लेषण लिखा:

“क्या पुष्यभूति राजवंश की मुहर का जमीन पर गिरना एक अपशगुन था? नहीं। क्योंकि जो मुहर जमीन पर गिरी, उसने पूरी धरती पर पुष्यभूति राजाओं की यशकीर्ति की अमिट छाप छोड़ दी।”

अर्थात, सम्राट हर्ष ने अपने पौरुष, वीरता और संकल्प से अपशगुन को भी शगुन में बदल दिया और विधाता के लिखे लेख को अपनी तलवार की नोंक से दोबारा लिखा।

महादानवीर और सांस्कृतिक नायक

सम्राट हर्षवर्धन केवल एक कुशल युद्धकौशल के धनी ही नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास के सबसे बड़े दानवीरों में से एक माने जाते हैं। प्रयाग (इलाहाबाद) में हर पांच साल पर आयोजित होने वाले ‘महामोक्ष परिषद’ (जिसे आज हम कुंभ मेले के रूप में जानते हैं) की शुरुआत का श्रेय उन्हीं को जाता है। वहां वे अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि अपने वस्त्र भी दान कर दिया करते थे।

आज के समाज के लिए प्रेरणा

आज महादानवीर सम्राट हर्षवर्धन बैस की जयंती के इस पावन अवसर पर हमें उनके जीवन से सबसे बड़ी सीख यही मिलती है कि हमें परिस्थितियों या भाग्य के भरोसे नहीं बैठना चाहिए। वर्तमान पीढ़ी को राजपुत्र हर्ष के जीवन से प्रेरणा लेकर ‘भाग्यजीवी’ नहीं बल्कि ‘पुरुषार्थजीवी’ बनना चाहिए, क्योंकि मेहनत और दृढ़ संकल्प से किसी भी विपरीत परिस्थिति को बदला जा सकता है।
क्षत्रिय कुलभूषण, महान दानवीर और अद्वितीय योद्धा सम्राट हर्षवर्धन बैस को उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन!

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