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बिहार-झारखंड बंटवारे के 26 साल बाद कर्मचारियों के हक में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, देरी पर लगेगा भारी ब्याज

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के बाद दो राज्यों के बीच उलझे सरकारी निगमों के कर्मचारियों के वेतन और भत्तों के भुगतान को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि ढाई दशकों से जारी यह गतिरोध सिर्फ दो राज्यों के बीच का वित्तीय विवाद नहीं है। वेतन और सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित रखना सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आजीविका और मानवीय गरिमा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

न्यायाधीश विक्रम नाथ और न्यायाधीश संदीप मेहता की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जस्टिस दिनेश माहेश्वरी (रिटायर्ड) समिति की अंतिम रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लिया। इस विस्तृत जांच के बाद अदालत ने प्रभावित कर्मचारियों को बड़ी राहत प्रदान की है।

समिति की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

जस्टिस दिनेश माहेश्वरी समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपने से पहले कुल 25 बैठकें कीं। रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, पांच प्रमुख राज्य निगमों (बिहार राज्य निर्माण निगम, बिहार राज्य औद्योगिक विकास निगम, बिहार राज्य इलेक्ट्रॉनिक विकास निगम, बिहार राज्य वन विकास निगम और बिहार पंचायती राज वित्तीय निगम) के कुल 2,274 सत्यापित कर्मचारियों की पहचान की गई थी। इनमें से 2,017 कर्मचारियों या उनके कानूनी वारिसों को उनके वैध बकाए का भुगतान सुनिश्चित कराया जा चुका है । हालांकि, 231 कर्मचारी अब भी ‘लापता’ (Untraceable) श्रेणी में हैं, जिनके परिजनों को सामने आकर नोडल अधिकारियों के पास दस्तावेज सत्यापित कराने होंगे।

वेतन आयोग और दैनिक वेतनभोगी पर रुख साफ

अदालत ने समिति की इस सिफारिश को स्वीकार कर लिया कि जो निगम पूरी तरह बंद (Defunct) हो चुके हैं, उनके कर्मचारी नए या आगामी वेतन आयोग (PRC) के लाभ का दावा कानूनी रूप से नहीं कर सकते। कर्मचारियों को केवल वही वेतनमान मिलेगा जो उनके निगम के चालू रहने के दौरान बोर्ड द्वारा औपचारिक रूप से स्वीकृत था ।

इसके अलावा, दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को लेकर कोर्ट ने माना कि चूंकि निगम बंद होने के बाद उन्होंने वास्तव में कोई शारीरिक कार्य नहीं किया था, इसलिए मानवीय आधार पर उन्हें साल 1992 की तय न्यूनतम दर (₹42.50 प्रति दिन) के हिसाब से सेवा समाप्ति तक दी गई काल्पनिक निरंतरता (Notional Continuity) पूरी तरह उचित और न्यायसंगत है (pp. 19-20)।

भविष्य निधि (PF) पर सख्त निर्देश और भारी ब्याज

सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) को एक संप्रभु और सुरक्षित वैधानिक अधिकार माना है, जिसे किसी भी प्रशासनिक लापरवाही या वित्तीय तंगी के बहाने रोका नहीं जा सकता । कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जिन मामलों में पुराना पीएफ रिकॉर्ड गायब हो चुका है, वहां बिहार और झारखंड सरकार सीधे अपने खजाने से नियोक्ता (Employer) और कर्मचारी दोनों का हिस्सा मिलाकर ब्याज सहित भुगतान करेंगी ।

विवाद को पूरी तरह खत्म करने के लिए कोर्ट ने बकाए के भुगतान में हुई अत्यधिक देरी पर सख्त रुख अपनाते हुए ब्याज दरों की घोषणा की है:

* बकाया वेतन (Salary Arrears): इस पर 7.5% वार्षिक की दर से साधारण ब्याज देना होगा।
* भविष्य निधि (PF Dues): इस पर 12% वार्षिक की दर से दंडात्मक ब्याज देय होगा ।

समिति को सम्मान और अगली तारीख

सुप्रीम कोर्ट ने इस बेहद जटिल और मानवीय त्रासदी से जुड़े मामले को सुलझाने के लिए जस्टिस दिनेश माहेश्वरी समिति के प्रयासों की सराहना की है। कोर्ट ने उनके लिए ₹35 लाख के अतिरिक्त मानदेय (Honorarium) को मंजूरी दी है, जिसे बिहार और झारखंड सरकार चार हफ्तों के भीतर आधा-आधा वहन करेंगी ।

दैनिक वेतनभोगियों के मुआवजे, बचे हुए कर्मचारियों के दावों के अंतिम निपटारे और ब्याज गणना जैसे शेष कानूनी बिंदुओं पर अंतिम निर्णय लेने के लिए कोर्ट ने दोनों राज्यों को अनुपालन हलफनामा (Compliance Affidavit) दाखिल करने को कहा है । इस केस को आंशिक रूप से सुनी गई (Part-Heard) श्रेणी में बरकरार रखते हुए अगली सुनवाई के लिए 1 सितंबर, 2026 की तारीख मुकर्रर की गई है।

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