डीएनए टेस्ट के आदेश के खिलाफ याचिका खारिज: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सच जानने का अधिकार प्राइवेसी से ऊपर
नई दिल्ली:सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था दी है कि किसी व्यक्ति के पितृत्व (paternity) का पता लगाने के लिए डीएनए (DNA) टेस्ट का आदेश तभी दिया जाना चाहिए जब सच्चाई तक पहुंचने का कोई अन्य साधन न बचा हो। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में बच्चे के सच जानने के अधिकार और प्राइवेसी के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। इसी के साथ कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के एक व्यक्ति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने निचली अदालत द्वारा दिए गए डीएनए टेस्ट के आदेश को चुनौती दी थी।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला छत्तीसगढ़ के बसना का है। अमर प्रधान नामक एक युवक ने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर दावा किया था कि वह चतुर्भुज प्रधान (CP) का बेटा है और संपत्ति में अपने हकदार हिस्से की मांग की थी। अमर का कहना था कि उसकी मां और चतुर्भुज के बीच संबंधों के चलते उसका जन्म सितंबर 1999 में हुआ था।
दूसरी ओर, चतुर्भुज प्रधान लगातार पितृत्व से इनकार करता रहा। निचली अदालत और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए चतुर्भुज को डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया था, जिसे उसने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिसवर सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पूर्व के फैसलों का हवाला दिया और निम्नलिखित मुख्य बातें कहीं:
* अंतिम विकल्प के रूप में डीएनए: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डीएनए टेस्ट का आदेश रूटीन तौर पर नहीं दिया जा सकता । जब अदालत को लगे कि रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य साक्ष्यों से पितृत्व का फैसला होना असंभव है, तभी यह टेस्ट कराया जाना चाहिए ।
* अधिकारों का संतुलन: कोर्ट ने माना कि जहां याचिकाकर्ता को अपनी गोपनीयता (Privacy) का अधिकार है, वहीं बेटे को भी यह जानने का पूरा हक है कि उसका जैविक पिता कौन है। इस मामले में बेटे के हितों का पलड़ा भारी है।
* भविष्य पर असर: अदालत ने कहा कि यदि इस वैज्ञानिक प्रक्रिया से सच सामने नहीं आया, तो अमर को जीवनभर उन अधिकारों से वंचित रहना पड़ सकता है जो उसे चतुर्भुज का बेटा होने के नाते मिल सकते हैं।
“जब किसी मामले में पितृत्व का सवाल सीधे तौर पर जुड़ा हो और सच तक पहुंचने का कोई दूसरा रास्ता न हो, तो न्याय के हित में डीएनए टेस्ट का आदेश बिल्कुल सही है।”
याचिका खारिज, टेस्ट कराने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने से साफ इनकार करते हुए चतुर्भुज प्रधान की अपील को खारिज कर दिया. शीर्ष अदालत ने संबंधित सिविल कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह डीएनए टेस्ट कराने के लिए तारीख तय करे और टेस्ट की रिपोर्ट के आधार पर सिविल सूट की कार्यवाही को आगे बढ़ाए.