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परिसीमन और संसद/विधान सभाओं की संख्या बढ़ाने का बिल भाजपा की तानाशाही और हिन्दू राष्ट्र स्थापित करने के औजार – महासभा पुरजोर विरोध करती है

Ranchi: 16-18 अप्रैल 2026 के विशेष बजट सत्र में केंद्र सरकार ऐसे तीन विधेयक पेश की है जिसका देश के लोकतान्त्रिक ढांचे और चुनावी मैप पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ेगा। ये विधेयक परिसीमन, महिला आरक्षण और लोक सभा व विधान सभाओं की संख्या बढ़ाने से संबंधित हैं। ऐसे महत्त्वपूर्ण विषयों के बिल को इस प्रकार हड़बड़ी में बिना व्यापक जन चर्चा व राजनैतिक दलों के साथ परामर्श किए लाना फिर से दर्शाता है कि मोदी सरकार की मंशा ही लोकतंत्र विरोधी है। 

हालांकि सरकार इसे संसद व विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने के नाम पर पेश कर रही है, लेकिन इसका असली उद्देश्य बिल्कुल अलग है। लोक सभा व विधान सभाओं में सीटों की संख्या बढ़ाने संबंधित विधेयक में चालाकी से बढ़ाने के अनुपात को नहीं बताया गया है। लोकसभा की सदस्य संख्या 543 से बढ़कर 816 और विधानसभाओं की कुल सीटें 4,123 से बढ़कर 6,186 हो जाएंगी। यह कहा गया है कि इसका आधार जनगणना 2011 होगा। इसका मतलब साफ है दक्षिण के राज्यों, जहां भाजपा कमजोर है, के सीटों की अनुपात अभी की तुलना में कम होंगी। और भाजपा के हिंदुत्व वाले राज्यों के सीटों की अनुपात बढ़ेगी।

इसको अगर परिसीमन के बिल के साथ जोड़ के देख जाए, तो खेल साफ होता है। संविधान के प्रावधानों को बदल के इस बिल में प्रस्तावित की जा रहा है कि किसी भी समय किसी भी जनगणना को आधार बनाकर परिसीमन किया जा सकता है। वर्तमान बिल के अनुसार परिसीमन आयोग में तीन सदस्य होंगे – एक पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के जज, मुख्य चुनाव आयुक्त या उनके प्रतिनिधि और संबंधित राज्य के चुनाव आयोग के प्रतिनिधि। आयोग के निर्णय को कोर्ट में चुनौती देने पर भी पाबंदी है।

कुछ मूल सिद्धांतों जैसे अनुसूचित जाति व जनजाति के अनुपात अनुसार सीटों का आरक्षण, के अलावा संविधान में परिसीमन के मानक निर्धारित नहीं है। चुनाव आयोग के कुछ मार्गदर्शिका हैं लेकिन वे संवैधानिक रूप से बाध्य नहीं हैं। इसलिए परिसीमन आयोग जैसी चाहे वैसा चुनावी क्षेत्र बना सकती है। जम्मू कश्मीर और असम के 2023 के परिसीमन से इसका खतरा समझा जा सकता है।

इन दोनों राज्यों में पहले से बने विधान सभा क्षेत्रों के खास क्षेत्रों/बूथों को इधर से उधर किया गया है, भले ही भौगोलिक रूप से संटा हुआ नहीं है। इसका उद्देश्य केवल भाजपा समर्थक समुदायों को जोड़ना और विरोधी समुदायों को बांटना था। अगर किसी आसपास के 2-3 विधान सभाओं में मुसलमानों का प्रभाव ज़्यादा था, तो वैसे बूथों को इधर से उधर करके ऐसा विधान सभा बनाया गया है जिसमें वे या तो बंट जाए या भाजपा समर्थक समुदाय एकजुट हो जाए। इस प्रकार असम में 35 विधान सभाओं, जहां मुसलमान समुदाय का प्रभाव था और मुसलमान प्रतिनिधि चुने जाते थे, को काम कर के अब 20 कर दिया गया है।

ये कानून भारत के चुनावी लोकतंत्र को मौलिक रूप से नया आकार देंगे और देश के हर मतदाता पर प्रभाव डालेंगे। इन कानूनों के दूरगामी परिणामों को देखते हुए, यह चौंकाने वाली बात है कि देश के नागरिकों को इन बिलों की सामग्री, उनके प्रभावों और इन संवैधानिक तथा विधायी संशोधनों को लाने के पीछे के तर्क के बारे में पूरी तरह से अंधेरे में रखा गया है। प्रस्तावित कानूनों के बारे में जानकारी लोगों तक केवल “सूत्रों” पर आधारित मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से ही पहुँच रही है। यह लोगों के सूचना के मौलिक अधिकार और ‘पूर्व-विधायी परामर्श नीति’ में निर्धारित सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है।

मोदी सरकार की तानाशाही रवैए और चुनाव आयोग की भाजपा वंदना से इतना तो साफ है कि अब पूरे देश में, खास कर भाजपा विरोधी राज्यों और चुनावी क्षेत्रों, में यही खेल चलेगा।

महासभा का मानना है कि ये भाजपा को केंद्र व राज्यों में दशकों तक सत्ता कब्ज़ा करके हिन्दू राष्ट्र बनाने की एक स्पष्ट और गंभीर साजिश है। महिला आरक्षण केवल एक मुखौटा है।

झारखंड जनाधिकार महासभा मांग करती है कि तीनों बिल को रद्द किया जाए। महासभा जनता व इंडिया दलों से अपील करती है कि वे मजबूती के साथ इसका सड़क से संसद तक विरोध करें। मोदी सरकार संसद व विधान सभाओं की वर्तमान संख्या पर तुरंत 33% महिला आरक्षण लागू करें। संख्या बढ़ाने और परिसीमन पर पहले व्यापक जन चर्चा और राजनैतिक दलों के साथ विमर्श हो। इसके बाद ही इसका स्वरूप तय हो।

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