सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्रियों के मामले को बताया ‘बेहद गंभीर’, केंद्र से ‘रोकथाम’ पर ध्यान देने को कहा
New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री (सी-सीम) से निपटने से संबंधित अपने पहले के निर्देशों को लागू करते समय केंद्र सरकार को ‘रोकथाम’ पर भी ध्यान देना चाहिए और ऐसे उपायों पर विचार करना चाहिए, जिनसे इस तरह की सामग्री ऑनलाइन सामने आने से पहले ही उसे रोका जा सके।
कोर्ट ने यह टिप्पणी जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस (जेसीआरए) की ओर से उसके संस्थापक भुवन ऋभु के माध्यम से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिका में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस एवं अन्य बनाम एस. हरीश एवं अन्य मामले में 23 सितंबर, 2024 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग की गई है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने की। अब इस मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि फैसले को आए दो साल हो चुके हैं, लेकिन उसमें दिए गए निर्देशों का अब तक पालन नहीं किया गया है। इसके जवाब में केंद्र सरकार ने कहा कि वह अब तक की कार्रवाई का विवरण देते हुए एक हलफनामा दाखिल करेगी। सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री से जुड़े मामलों से निपटने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार की जा रही है और अंतिम रूप दिए जाने के बाद इसे रिकॉर्ड पर रखा जाएगा।
पीठ ने गौर किया कि अपने पिछले 14 अगस्त, 2026 को पारित आदेश में केंद्र सरकार को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय के माध्यम से विविध आवेदन के विषय से संबंधित अपना जवाब और रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, अब तक ऐसा कोई जवाब रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया है।
पीठ ने मामले को ‘बेहद गंभीर’ बताते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय को अपना जवाब और रिपोर्ट दाखिल करने का एक आखिरी अवसर दिया।
अदालत ने कहा कि केंद्र को अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट करना होगा कि वह क्या कदम उठाने का प्रस्ताव रखता है, 23 सितंबर, 2024 के फैसले में दिए गए निर्देशों को किस तरह लागू करने की योजना है। साथ ही यह सुनिश्चित करने के लिए क्या एहतियाती उपाय किए जाएंगे कि बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर सामने ही न आए।
अदालत ने केंद्र को यह भी निर्देश दिया कि बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री से जुड़े मामलों से निपटने के लिए तैयार की जा रही मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का मसौदा अगली सुनवाई से कम से कम चार-पांच दिन पहले याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराया जाए, ताकि वह उस पर अपनी टिप्पणियां और सुझाव दे सके।
मामले में सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष पेश हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संस्थापक भुवन ऋभु ने कहा, “मैं सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करता हूं, जिसने बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार संबंधी सामग्री (सी-सीम) से निपटने की तत्काल आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित किया है। अदालत ने ‘प्रिवेंशन बाय डिजाइन’ यानी ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है, जो शुरुआत से ही बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। साथ ही, सरकार से प्रभावी क्रियान्वयन, जवाबदेही तय करने और बच्चों को ऑनलाइन शोषण से बचाने के लिए त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने का आह्वान किया है।”