रांची: सार्वजनिक सेवा की ईमानदारी और शुचिता को बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण फैसले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने झारखंड उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक कांस्टेबल को बहाल करने को कहा गया था। इस कांस्टेबल पर झारखंड और बिहार पुलिस, दोनों जगह अलग-अलग पहचान बनाकर एक साथ नौकरी करने का आरोप था।
मामले का विवरण:
यह मामला 2005 का है जब रंजन कुमार को झारखंड पुलिस में कांस्टेबल के रूप में नियुक्त किया गया था। दिसंबर 2007 में, ड्यूटी के दौरान वह दो दिनों की छुट्टी पर गए लेकिन वापस नहीं लौटे। जांच में पता चला कि उनकी “अनधिकृत अनुपस्थिति” के दौरान, संतोष कुमार नाम के एक व्यक्ति ने फर्जी प्रमाणपत्रों का उपयोग करके बिहार पुलिस में कांस्टेबल का पद हासिल कर लिया था। अधिकारियों ने आरोप लगाया कि रंजन कुमार और संतोष कुमार असल में एक ही व्यक्ति थे, जो दो राज्यों से वेतन लेने के लिए दोहरी पहचान का उपयोग कर रहे थे।
कानूनी कार्यवाही:
* 2015: विभागीय जांच के बाद, गढ़वा के पुलिस अधीक्षक ने रंजन कुमार को सेवा से बर्खास्त कर दिया। झारखंड हाईकोर्ट की एकल पीठ ने भी इस फैसले को सही ठहराया।
* 2022: हाईकोर्ट की एक खंडपीठ (Division Bench) ने इस निर्णय को पलटते हुए कहा कि दोहरी पहचान साबित करने के लिए “कोई सबूत नहीं” है।
* सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार पुलिस को नई फोरेंसिक जांच के आदेश दिए। फिंगरप्रिंट विश्लेषण और बायोमेट्रिक रिकॉर्ड के माध्यम से इस धोखाधड़ी की पुष्टि हुई।
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ:
न्यायमूर्ति आर. महादेवन की अध्यक्षता वाली पीठ ने जोर देकर कहा कि पुलिस अधिकारियों को ईमानदारी के उच्चतम मानकों का पालन करना चाहिए। कोर्ट ने कहा:
* “यह दो राज्यों के पुलिस बलों के साथ जानबूझकर की गई धोखाधड़ी है, जिसमें जाली दस्तावेजों के सहारे सार्वजनिक रोजगार हासिल किया गया।”
* कोर्ट ने हाईकोर्ट की आलोचना करते हुए कहा कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का अर्थ साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करना नहीं है, जैसा कि एक अपीलीय अदालत करती है।
* “सार्वजनिक रोजगार, विशेष रूप से पुलिस सेवा, धोखाधड़ी का साधन नहीं बन सकती। यदि कानून लागू करने वाले ही धोखे से सेवा में प्रवेश करेंगे, तो इससे कानून के शासन पर से भरोसा उठ जाएगा।”
अंतिम फैसला:
सुप्रीम कोर्ट ने बर्खास्तगी के मूल आदेश को बहाल कर दिया और अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग करते हुए बिहार पुलिस में की गई नियुक्ति को भी रद्द कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने दोनों राज्यों के पुलिस महानिदेशकों (DGP) को आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और प्रतिरूपण (impersonation) के लिए आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया है।