राँची: पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ी जीत हासिल करते हुए, प्रधान जिला न्यायाधीश (द्वितीय) अनिल कुमार मिश्रा की अदालत ने एक विवादास्पद राजस्व आदेश को पलट दिया है। इस फैसले के साथ ही मौजा तेतुलिया की लगभग 75 एकड़ जमीन वापस झारखंड वन विभाग को मिल गई है।
अदालत के इस फैसले ने औपनिवेशिक रिकॉर्ड्स के ‘गायब’ होने से जुड़े कथित धोखाधड़ी के जाल को ध्वस्त कर दिया है। 5 मई (मंगलवार) को जारी इस आदेश के साथ ही प्रभागीय वन अधिकारी (DFO) रजनीश कुमार के नेतृत्व में लड़ी जा रही एक उच्च-स्तरीय कानूनी लड़ाई का सुखद अंत हुआ।
विवाद की जड़
यह पूरा विवाद आर.एस. प्लॉट संख्या 1263 और 1287 से जुड़ा था, जो मूल रूप से “जंगल साल” (वन भूमि) के रूप में दर्ज थे। दशकों से यह जमीन सार्वजनिक उपयोग और निजी स्वार्थों के बीच फंसी हुई थी। 2022 में, एक निचले राजस्व अधिकारी ने पुरुलिया के कथित 1933 के ‘नीलामी बिक्री प्रमाण पत्र’ के आधार पर इस जमीन को ‘उमायुष मल्टीकॉम प्राइवेट लिमिटेड’ के नाम करने का आदेश दिया था। साथ ही, रिकॉर्ड से राज्य सरकार और सेल (SAIL)/बोकारो स्टील प्लांट के नाम हटा दिए गए थे।
धोखाधड़ी का पर्दाफाश
तत्कालीन DFO रजनीश कुमार की जांच ने इस “धोखाधड़ी के खेल” को बेनकाब कर दिया। जांच में पाया गया कि:
* 1933 के जिस प्रमाणपत्र का हवाला दिया गया, उसमें रजिस्ट्री वॉल्यूम के पेज 83 और 84 का जिक्र था, जबकि उस वॉल्यूम में कुल केवल 80 पेज ही थे।
* मूल मुकदमा शुरू में मात्र 10 डिसमिल जमीन के लिए था, जिसे निजी हस्तक्षेपकर्ताओं ने चालाकी से बढ़ाकर 75 एकड़ कर दिया।
जोखिम उठाकर बचाया जंगल
अदालत ने अपने फैसले में विशेष रूप से तत्कालीन DFO रजनीश कुमार के प्रयासों की सराहना की, जिन्होंने इस वन भूमि को बचाने के लिए व्यक्तिगत और पेशेवर जोखिम उठाए। कुमार ने पुरुलिया रजिस्ट्री की गहराई से जांच कर फर्जी “वॉल्यूम 58” का खुलासा किया।
दिसंबर 2024 में, कुमार ने भू-माफियाओं से मिली धमकियों के बाद बोकारो एसपी को पत्र लिखकर सशस्त्र सुरक्षा की मांग की थी। 2025 में, जमीन पर गैर-वन कार्यों की अनुमति न देने के कारण उन्हें उच्च न्यायालय में अवमानना (Contempt) का सामना भी करना पड़ा, जिसके लिए अंततः उन्हें सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम सुरक्षा मिली। उनका स्पष्ट रुख था कि यह जमीन “अछूता जंगल” (Unbroken Forest) है।
अदालत का फैसला
न्यायाधीश मिश्रा के फैसले ने कुमार के पक्ष को सही ठहराया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व अधिकारी को वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना “जंगल साल” की प्रकृति को “परती भूमि” में बदलने का कोई अधिकार नहीं है।
अदालत ने टिप्पणी की कि जब कोई सार्वजनिक दावा “धोखाधड़ी और छल” पर आधारित हो, तो वह टिक नहीं सकता। इस फैसले ने न केवल भूमि की संरक्षित स्थिति बहाल की है, बल्कि अतिक्रमित वन भूमि के अवैध “नियमितीकरण” के खिलाफ एक कड़ा संदेश भी दिया है।