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Deepfake के दौर में बदला कानून: भारत में महिलाओं की डिजिटल सुरक्षा के लिए नए नियम क्या कहते हैं?

लेखक: वर्तिका लाल

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने हमारी जिंदगी को जितना आसान बनाया है, इसके कुछ खतरनाक पहलू भी उतनी ही तेजी से सामने आ रहे हैं। आज कुछ ही सेकंड में किसी की भी हूबहू तस्वीर बनाना, आवाज बदलना या बिल्कुल वास्तविक दिखने वाला वीडियो तैयार करना मुमकिन हो गया है। तकनीक के इसी भ्रामक रूप को ‘Deepfake’ कहा जाता है।
वर्तमान दौर में किसी महिला की सहमति के बिना उसकी तस्वीर को अश्लील रूप देना, उसकी आवाज की नकल (Voice Cloning) करके झूठे बयान दिलवाना या उसके चेहरे को किसी आपत्तिजनक वीडियो में लगा देना बेहद आम और वास्तविक खतरे बन चुके हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि भारत का कानून डिजिटल दुनिया में महिलाओं की सुरक्षा के लिए आज क्या कहता है?

अच्छी बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने इस दिशा में बेहद कड़े और ऐतिहासिक कानूनी कदम उठाए हैं। विशेष रूप से साल 2026 में Information Technology (IT) Rules में किए गए संशोधनों ने AI-generated और हेरफेर की गई सामग्री (manipulated content) को नियंत्रित करने के लिए एक मजबूत ढांचा तैयार किया है।

1. सबसे बड़ा बदलाव: “Synthetically Generated Information” (SGI) की कानूनी पहचान

10 फरवरी 2026 को भारत सरकार ने Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 में महत्वपूर्ण बदलाव किए, जो 20 फरवरी 2026 से पूरे देश में लागू हो गए।
इन नए नियमों के तहत पहली बार “Synthetically Generated Information” (SGI) को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है:

* SGI का अर्थ: ऐसा कोई भी ऑडियो, इमेज या वीडियो जिसे कंप्यूटर, एआई टूल या एल्गोरिदम की मदद से इस तरह बनाया या बदला गया हो कि वह बिल्कुल किसी वास्तविक व्यक्ति या घटना जैसा दिखाई दे और लोगों को सच लगे।
* इसके दायरे में सभी प्रकार के Deepfake वीडियो, AI-generated तस्वीरें और रियलिस्टिक वॉइस क्लोनिंग शामिल हैं। पहले इसके लिए कोई सटीक कानूनी परिभाषा नहीं थी, लेकिन अब इसे सीधे IT Rules के दायरे में ला दिया गया है।

क्या हर AI कंटेंट गैरकानूनी है?
नहीं, कानून का निशाना तकनीक नहीं बल्कि उसका गलत इस्तेमाल है। सामान्य वीडियो एडिटिंग, कलर करेक्शन, noise reduction, शैक्षणिक (educational) या रिसर्च के काम और रचनात्मक उपयोग को इस परिभाषा से बाहर रखा गया है, बशर्ते वे मूल संदर्भ को गलत तरीके से विकृत (distort) न करते हों।

2. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की बढ़ी जिम्मेदारी और ‘लेबलिंग’ नियम
अब फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर) या एआई टूल देने वाले प्लेटफॉर्म्स अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते। नए नियमों के मुताबिक:

* प्लेटफॉर्म्स को ऐसे कड़े तकनीकी इंतजाम करने होंगे जिससे महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली सामग्री (जैसे non-consensual intimate imagery, यौन रूप से स्पष्ट या फेक डॉक्यूमेंट्स) उनके सिस्टम से न तो बनाई जा सके और न ही शेयर हो सके।
* 10% हिस्से पर अनिवार्य लेबल: यदि कोई कंटेंट एआई द्वारा तैयार (synthetic) है, तो उसे छिपाकर असली रूप में पेश नहीं किया जा सकता। विजुअल कंटेंट के कम से कम 10 प्रतिशत सतह क्षेत्र (surface area) पर और ऑडियो के शुरुआती 10 प्रतिशत समय (duration) में साफ तौर पर यह लिखना या दिखाना होगा कि यह एक सिंथेटिक कंटेंट है। इसके लिए परमानेंट यूनिक मेटाडेटा (metadata) या आइडेंटिफायर की व्यवस्था की गई है।
* बड़े प्लेटफॉर्म्स (Significant Social Media Intermediaries) को अब अपने यूजर्स से अपलोडिंग के समय यह घोषणा (declaration) लेनी होगी कि कंटेंट एआई-जनरेटेड है या नहीं, और प्लेटफॉर्म को ऑटोमेटेड टूल्स की मदद से इसकी सत्यता भी जांचनी होगी।

3. महिलाओं के लिए सबसे राहत भरा नियम: अब मात्र 2 घंटे में होगी कार्रवाई

महिलाओं की प्राइवेसी और डिजिटल सम्मान की रक्षा के लिए 2026 के नियमों में सबसे बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव समय सीमा को लेकर किया गया है:

* यदि किसी शिकायत में महिला की गरिमा से खिलवाड़ करने वाला कंटेंट, कृत्रिम रूप से मॉर्फ्ड (morphed) तस्वीरें, नग्नता (nudity) या इलेक्ट्रॉनिक प्रतिरूपण (electronic impersonation) शामिल है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को शिकायत मिलने के मात्र 2 घंटे के भीतर उस कंटेंट को हटाना होगा या उसकी एक्सेस ब्लॉक करनी होगी।
* इससे पहले इस तरह की शिकायतों पर कार्रवाई के लिए 24 घंटे का समय मिलता था। चूंकि इंटरनेट पर डीपफेक कंटेंट बहुत तेजी से वायरल होता है, इसलिए नुकसान को तुरंत रोकने के लिए इस समय को घटाकर 2 घंटे किया गया है। इसके साथ ही सामान्य शिकायतों के निपटारे (Grievance Redressal) के समय को भी अब काफी कम कर दिया गया है।

4. नए क्रिमिनल लॉ और डेटा प्रोटेक्शन का चौतरफा सुरक्षा कवच
डीपफेक से निपटने के लिए भारत में सिर्फ आईटी नियम ही नहीं, बल्कि पूरा कानूनी तंत्र बदला है:

* भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS): 1 जुलाई 2024 से लागू हुए इस नए आपराधिक कानून की धारा 75 (यौन उत्पीड़न/sexual harassment) और धारा 77 (गुप्त रूप से देखना या तस्वीरें फैलाना/voyeurism) के तहत किसी महिला की सहमति के बिना उसकी निजी तस्वीरें बनाना या प्रसारित करना गंभीर अपराध है। इसके अलावा मानहानि (defamation) और पीछा करने (stalking) से जुड़ी धाराएं भी मामले के आधार पर लागू होती हैं।
* डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 और नियम, 2025: यह कानून लोगों की निजी जानकारी (तस्वीर, आवाज, वीडियो) के गलत इस्तेमाल पर लगाम लगाता है। हालांकि, 13 नवंबर 2025 की अधिसूचना के अनुसार इसके सभी प्रावधान एक साथ नहीं, बल्कि अलग-अलग चरणों (कुछ 12 महीने और कुछ 18 महीने बाद) में लागू हो रहे हैं।
* भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023: डिजिटल अपराधों में स्क्रीनशॉट, ओरिजिनल फाइल्स, यूआरएल (URLs) और मेटाडेटा को कोर्ट में पुख्ता इलेक्ट्रॉनिक सबूत (Digital Evidence) के तौर पर पेश करने के लिए यह नया साक्ष्य ढांचा बेहद मददगार साबित हो रहा है।

5. क्या भारत में ‘Deepfake’ बनाना अपने आप में सीधा अपराध है?

यह समझना बहुत जरूरी है कि भारत में फिलहाल कोई अलग या स्वतंत्र “डीपफेक एक्ट” नहीं है, जिसके तहत केवल डीपफेक बनाने मात्र को ही अपराध घोषित किया गया हो।
आज की कानूनी व्यवस्था का मॉडल बहुत व्यावहारिक है: जैसे ही कोई एआई-जनरेटेड कंटेंट सामने आता है, सबसे पहले उसके जरिए होने वाले नुकसान (जैसे महिला की प्राइवेसी का हनन, धोखाधड़ी या मानहानि) को देखा जाता है और फिर उसी के आधार पर आईटी एक्ट या भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराएं लगाई जाती हैं।

चुनौतियां अभी भी बाकी हैं

2 घंटे में कंटेंट हटाने का नियम ऐतिहासिक है, लेकिन एक बार इंटरनेट पर आए कंटेंट को बार-बार री-अपलोड होने से रोकना, विदेशी वेबसाइट्स और सीक्रेट चैट्स (private groups) में फैलने से बचाना आज भी एक बड़ी तकनीकी और फॉरेंसिक चुनौती है। इसके लिए भविष्य में एक पीड़ित-केंद्रित (victim-centred) और ज्यादा एकीकृत कानूनी ढांचे की जरूरत महसूस हो सकती है।

निष्कर्ष:

आने वाला समय पूरी तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का है। हमारा मकसद तकनीक से डरना या उसे रोकना नहीं होना चाहिए, बल्कि एक ऐसा सुरक्षित डिजिटल माहौल बनाना है जहां नई तकनीक का स्वागत भी हो और किसी महिला की प्राइवेसी, सहमति (consent) और सम्मान भी पूरी तरह सुरक्षित रहे। किसी महिला की तस्वीर को मॉर्फ करने में कुछ सेकंड जरूर लगते हैं, लेकिन उसका मानसिक और सामाजिक असर बरसों तक रहता है; कानून में हुए ये नए बदलाव इसी अंतर को पाटने की एक बेहद मजबूत और जरूरी कोशिश हैं।

(साभार: प्रस्तुत शोध और विश्लेषण पर आधारित)

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