रांची में ‘उलगुलान परिवर्तन यात्रा’ का शंखनाद: जल, जंगल, जमीन और स्थानीय अधिकारों के लिए आदिवासी-मूलवासी समाज ने भरी हुंकार
रांची: झारखंड अलग राज्य बनने के 78 वर्षों के बाद भी स्थानीय नीति, रोजगार, शिक्षा और जल-जंगल-जमीन के अधूरे अधिकारों को लेकर एक बार फिर बड़े आंदोलन की शुरुआत हो गई है। रांची के हटिया स्थित सोलंकी चौक, मौजा कल्याणपुर सरना स्थल पर ‘उलगुलान परिवर्तन यात्रा एवं सभा’ का आयोजन किया गया। इस सभा में आदिवासी और मूलवासी समाज के लोगों ने एकजुट होकर अपने संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष का आह्वान किया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह उलगुलान किसी हिंसा के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था में जवाबदेही तय करने के लिए है।
सभा के दौरान राजनीतिक दलों और प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखे सवाल उठाए गए। वक्ताओं ने कहा कि चुनाव के समय तो आदिवासी-मूलवासी समाज को याद किया जाता है, लेकिन बाद में जनता की सुध लेने वाला कोई नहीं होता। आंदोलनकारियों ने साफ किया कि वे किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं हैं, बल्कि उनका यह संघर्ष जनता के हक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के खिलाफ है। इस अभियान को धार देने के लिए नीरजंना हरेंज, अजय टोप्पो, पूर्ण चंद्र मुंडा, आशुतोष चेरो, मनोज केरकेट्टा, तेजस, निर्मल खाखा, मदन मुंडा, उज्जवल टोप्पो, छोटू मुंडा और वार्ड पार्षद सुनीता तिग्गा समेत कई स्थानीय अगुवा मुख्य रूप से जुटे हैं।
इस उलगुलान यात्रा के जरिए सरकार के सामने पांच प्रमुख मांगें रखी गई हैं। पहली मांग के तहत ‘झारखंड भूमि संरक्षण एवं राजस्व जवाबदेही आयोग’ के गठन की बात कही गई है, ताकि आदिवासी जमीनों की रक्षा हो सके। दूसरी मांग में भ्रष्ट राजस्व अधिकारियों की अवैध संपत्ति जब्त करने और उन पर कड़ी कार्रवाई करने पर जोर दिया गया है। तीसरी मांग में भूमि विवादों, फर्जी म्यूटेशन और अवैध कब्जों के त्वरित निपटारे के लिए ‘विशेष भूमि फास्ट-ट्रैक न्यायालय’ बनाने की मांग की गई है। इसके अलावा, विकास परियोजनाओं से विस्थापित परिवारों को न्याय देने के लिए ‘राज्य विस्थापन एवं पुनर्वास आयोग’ को पूरी तरह सक्रिय करने और प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 1 से 5) में स्थानीय जनजातीय भाषाओं को अनिवार्य करने की मांग उठाई गई है। सभा का समापन “अधिकार हमारा — जवाबदेही आपकी” और “जय झारखंड” के गगनभेदी नारों के साथ हुआ।

