राहतगढ़ की सुबह हमेशा की तरह शांत नहीं थी। आज हूल दिवस था—वह दिन जब साल 1855 में सिदो, कान्हू, चांद और भैरव जैसे वीरों ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए शंखनाद किया था। गांव के चौक पर बनी वीर सेनानियों की प्रतिमाओं को गेंदे के फूलों से सजाया गया था।समारोह के बीच अचानक पुलिस की गाड़ियां आकर रुकीं। गाड़ियों से पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष राघव मुर्मू और उनके साथी अधिकारी उतरे। गांव के बुजुर्गों और युवाओं के चेहरों पर थोड़ी घबराहट दौड़ गई। उन्हें आज भी याद था कि उनके पूर्वजों ने इतिहास में तत्कालीन पुलिस और अंग्रेजी हुकूमत के हाथों कितने दर्दनाक जुल्म झेले थे।
दिग्गी थाना के तत्कालीन दारोगा महेश लाल दत्त के अत्याचारों की कहानियां आज भी इस मिट्टी की लोककथाओं में जिंदा थीं।राघव मुर्मू सीधे मंच की ओर बढ़े। उन्होंने माइक संभाला और भारी आवाज में बोलना शुरू किया:”जोहार भाइयों और बहनों। आज हूल क्रांति को 170 वर्ष पूरे हो चुके हैं। हम यहां सिर्फ फूलों का हार चढ़ाने नहीं आए हैं। हम यहां इतिहास की एक बहुत बड़ी कड़वी सच्चाई को स्वीकार करने आए हैं। साल 1855 में जो हुआ, वह अमानवीय था।
तत्कालीन पुलिस प्रशासन द्वारा हमारे संताल और आदिवासी समाज पर जो अत्याचार और दमन किया गया, वह एक ऐतिहासिक अन्याय था।”पंडाल में सन्नाटा छा गया। सब सांस रोककर सुन रहे थे।राघव ने हाथ जोड़कर सिर झुकाया और कहा, “अतीत की उन गलतियों से सीख लेते हुए, आज झारखंड पुलिस एसोसिएशन की ओर से मैं पूरे आदिवासी समाज से इस ऐतिहासिक अन्याय के लिए औपचारिक और दिल से माफी मांगता हूँ। हम पुरानी यादों के जख्मों को तो पूरी तरह नहीं भर सकते, लेकिन आने वाले कल में आपके विश्वास को कभी टूटने नहीं देंगे।”जैसे ही राघव मुर्मू ने अपने शब्द पूरे किए, वहां मौजूद बुजुर्गों की आंखों से आंसू छलक पड़े।
मंच के सामने खड़े एक नौजवान ने आगे बढ़कर राघव को गले लगा लिया।कनाडा में हुए कामागाटा मारू हादसे के लिए जिस तरह सालों बाद वहां की संसद ने माफी मांगकर एक नई शुरुआत की थी, ठीक वैसे ही आज इस छोटे से गांव में इतिहास की एक बहुत बड़ी भूल का प्रायश्चित हो रहा था। यह माफी सिर्फ शब्दों की नहीं थी, बल्कि समाज में खोए हुए विश्वास और मेल-मिलाप को फिर से मजबूत करने की एक संवेदनशील पहल थी।