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पंजाब केसरी लाला लाजपत राय ( (जन्मदिवस, 28 जनवरी पर विशेष)

अखिलेश सिंह 'चंदेल'

प्रारम्भिक जीवन      
                             
भारत की आजादी के आन्दोलन के प्रखर नेता लालालाजपत राय का नाम ही देशवासियों में स्फूर्ति तथा प्रेरणा का संचार कराता है। अपने देश, धर्म तथा संस्कृति के लिए उनमें जो प्रबल प्रेम तथा आदर था उसी के कारण वे स्वयं को राष्ट्र के लिए समर्पित कर अपना जीवन दे सके। भारत को स्वाधीनता दिलाने में उनका त्याग, बलिदान तथा देशभक्ति अद्वितीय और अनुपम थी। उनके बहुविधि क्रियाकलाप में साहित्य- लेखन एक महत्वपूर्ण आयाम है। वे उर्दू तथा अंग्रेजी के समर्थ रचनाकार थे।

लालाजी का जन्म 28 जनवरी 1865 को अपने ननिहाल के गाँव ढुंढिके (जिला फरीदकोट पंजाब) में हुआ था। उनके पिता लाला राधाकृष्ण लुधियाना जिले के जगरांव कस्बे के निवासी अग्रवाल वैश्य थे | लाला राधाकृष्ण अध्यापक थे, लाला लाजपतराय की शिक्षा पांचवें वर्ष में आरम्भ हुई। 1880 में उन्होंने कलकत्ता तथा पंजाब विश्वविद्यालय से प्रवेश परीक्षा एक वर्ष में पास की और आगे पढ़ने के लिए लाहौर आये। यहाँ वे गर्वमेंट कॉलेज में प्रविष्ट हुए और 1882 में एफ० ए० की परीक्षा तथा मुख्तारी की परीक्षा साथ-साथ पास की। यहीं वे आर्य समाज के सम्पर्क में आये और उसके सदस्य बन गये।

लाला सांईदास आर्यसमाज के प्रति इतने अधिक समर्पित थे कि वे होनहार नवयुवकों को इस संस्था में प्रविष्ट करने के लिए सदा तत्पर रहते थे। स्वामी श्रद्धानन्द (तत्कालीन लाला मुंशीराम) को आर्यसमाज में लाने का श्रेय भी उन्हें ही है। 30 अक्टूबर, 1883 को जब अजमेर में ऋषि दयानन्द का देहान्त हो गया तो 9 नवम्बर, 1883 को लाहौर आर्य समाज की ओर से एक शोकसभा का आयोजन किया गया।

इस सभा के अन्त में यह निश्चित हुआ कि स्वामी जी की स्मृति में एक ऐसे महाविद्यालय की स्थापना की जाये जिसमें वैदिक साहित्य, संस्कृति तथा हिन्दी की उच्च शिक्षा के साथ- साथ अंग्रेजी और पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान में भी छात्रों को दक्षता प्राप्त कराई जाये। 1886 में जब इस शिक्षण संस्थान की स्थापना हुई तो आर्य समाज के अन्य नेताओं के साथ लाला लाजपत राय का भी इसके संचालन में महत्वपूर्ण योगदान रहा तथा वे कालान्तर में डी० ए० बी० कालेज, लाहौर के महान स्तम्भ बने।

वकालत के क्षेत्र में

लाला लाजपत राय ने एक मुख्तार (छोटा वकील) के रूप में अपने मूल निवास स्थल जगरांव में ही वकालत आरम्भ कर दी थी, किन्तु यह कस्बा बहुत छोटा था, जहाँ उनके कार्य के बढ़ने की अधिक सम्भावना नहीं थी इसलिए वे रोहतक चले गये। रोहतक में, 1885 में वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण की, 1886 में वे हिसार आ गये। एक सफल वकील के रूप में 1886 तक वे यही रहे और इसी वर्ष लाहौर आये। तब से लाहौर ही उनकी सार्वजनिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया।

लालजी ने अपने साथियों सहित सामाजिक हित की योजनाओं के कार्यान्वन में योगदान किया किन्तु लाहौर जाने पर वे आर्यसमाज के अतिरिक्त राजनैतिक आन्दोलन के साथ भी जुड़ गये। 1888 में वे प्रथम बार कांग्रेस के इलाहाबाद अधिवेशन में सम्मिलित हुए जिनकी अध्यक्षता मि० जार्ज मूल ने की थी। 1906 में वे पं. गोपाल कृष्ण गोखले के साथ कांग्रेस के एक शिष्टमण्डल के सदस्य के रूप में इंग्लैण्ड गये। यहाँ से वे अमेरिका चले गये। उन्होंने कई बार विदेश यात्राएँ की और वहाँ रहकर पश्चिमी देशों के समक्ष भारत की राजनैतिक परिस्थिति की वास्तविकता से वहाँ के लोगों को परिचित कराया तथा उन्हें स्वाधीनता आन्दोलन की जानकारी दी।

लाला लाजपत राय ने अपने सहयोगियों- लोकमान्य तिलक तथा विपिन चन्द्र पाल के साथ मिलकर कांग्रेस में उग्र विचारों का प्रवेश कराया। 1885 में अपनी स्थापना से लेकर लगभग बीस वर्षो तक कांग्रेस ने एक राजभवन संस्था का चरित्र बनाये रखा था। इसके नेतागण वर्ष में एक बार बड़े दिन की छुट्टियों में देश के किसी नगर में एक होने और विनम्रता पूर्वक शासनों के सुतधारों (अंग्रेजों) से सरकारी उच्च सेवाओं में भारतीयों को अधिकाधिक संख्या में प्रविष्टि तथा युवराज के भारत आगमन पर उनका स्वागत करने का प्रस्ताव आया तो लाला जी ने उनका डटकर विरोध किया। कांग्रेस के मंच से यह अपनी किस्म का पहला तेजस्वी भाषण हुआ जिसमें देश की अस्मिता प्रकट हुई थी।

1907 में जब पंजाब के किसानों में अपने अधिकारों को लेकर चेतना उत्पन्न हुई तो सरकार का क्रोध लालाजी तथा सरदार अजीत सिंह (शहीद भगत सिंह के चाचा) पर उमड़ पड़ा और इन दोनों देशभक्त नेताओं को देश से निर्वासित कर उन्हें पड़ोसी देश बर्मा के मांडले नगर में, नजरबन्द कर दिया, किन्तु देशवासियों द्वारा सरकार के इस दमनपूर्ण कार्य का प्रबल विरोध किये जाने पर सरकार को अपना यह आदेश वापस लेना पड़ा। लालाजी फिर स्वदेश आये और देशवासियों ने उनका भव्य स्वागत किया। लालाजी के राजनैतिक जीवन की कहानी अत्यन्त रोमांचक तो है ही, भारतीयों को स्वदेश-हित के लिए बलिदान तथा महान् त्याग करने की प्रेरणा भी देती है।

जनसेवा के कार्य

लालाजी केवल राजनैतिक नेता और कार्यकर्ता ही नहीं थे। उन्होंने जन-सेवा का भी सच्चा पाठ पढ़ा था। जब 1886 तथा 1899 ( इसे राजस्थान में छप्पन का अकाल कहते हैं, क्योंकि यह विक्रम का 1956 का वर्ष था) में उत्तर भारत में भयंकर अकाल पड़ा तो लालाजी ने अपने साथी लाला हंसराज के सहयोग से अकाल पीड़ित लोगों को सहायता पहुंचाई। जिन अनाथ बच्चों को ईसाई पादरी अपनाने के लिए तैयार थे और जो उनका धर्म परिवर्तन करने के इरादे रखते थे उन्हें इन मिशनरियों के चंगुल से बचाकर फीरोजपुर तथा आगरा के आर्य अनाथालयों में भेजा। 1905 में कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) में भयंकर भूकम्प आया। उस समय भी लालाजी सेवा-कार्य में जुट गये और डी० ए० वी० कालेज लाहौर के छात्रों के साथ भूकम्प – पीड़ितों को राहत प्रदान कीं।

1907 – 08 में उड़ीसा, मध्य प्रदेश तथा संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश) से भी भयंकर दुर्भिक्ष, पड़ा और लालाजी को पीड़ितों की सहायता के लिए आगे आना पड़ा फिर राजनैतिक आन्दोलन में 1907 के सूरत के प्रसिद्ध कांग्रेस अधिवेशन में लाला लाजपत राय ने अपने सहयोगियों के द्वारा राजनीति में गरम दल की विचारधारा का सूत्रपात कर दिया था और जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गये थे कि केवल प्रस्ताव पास करने और गिड़गिड़ाने से स्वतन्त्रता मिलने वाली नहीं है। हम यह देख चुके हैं कि जनभावना को देखते हुए अंग्रेजों को उनके देश-निर्वासन को रद्द करना पड़ा था । वे स्वदेश आये और पुन: स्वाधीनता के संघर्ष में जुट गये। प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के दौरान वे एक प्रतिनिधिमण्डल के सदस्य के रूप में फिर इंग्लैण्ड गये और देश की आजादी के लिए प्रबल जनमत जागृत किया। वहाँ से वे जापान होत हुए अमेरिका चले गये और स्वाधीनता – प्रेमी अमेरिकावासियों के समक्ष भारत की स्वाधीनता का पक्ष प्रबलता से प्रस्तुत किया। यहाँ इंण्डियन होमरूल लीग की स्थापना की तथा कुछ ग्रन्थ भी लिखे।

जीवन संध्या

1928 में जब अंग्रेजो द्वारा नियुक्त साइमन कमीशन भारत आया तो देश के नेताओं ने उसका बहिष्कार करने का निर्णय लिया। 30 अक्टूबर, 1928 को कमीशन लाहौर पहुँचा तो जनता के प्रबल प्रतिशोध को देखते हुए सरकार ने धारा 144 लगा दी। लालाजी के नेतृत्व में नगर के हजारों लोग कमीशन के सदस्यों को काले झण्डे दिखाने के लिए रेलवे स्टेशन पहुँचे और साइमन वापस जाओ के नारों से आकाश गुंजा दिया।

इस पर पुलिस को लाठीचार्ज का आदेश मिला। उसी समय अंग्रेज साजेट साण्डर्स ने लालाजी की छाती पर लाठी का प्रहार किया जिससे उन्हें सख्त चोट पहुँची। उसी समय लाहौर की एक विशाल जनसभा में एकत्रित जनसमूह को सम्बोधित करते हुए नर केशरी लालाजी ने गर्जना करते हुए कहा – मेरे शरीर पर पड़ी लाठी की प्रत्येक चोट अंग्रेजी साम्राज्य के कफन कील का काम करेगी। इस दारुण प्रहार से आहत लालाजी ने अट्ठारह दिन तक विषम ज्वर पीड़ा भोगकर 17 नवम्बर, 1928 को परलोक के लिए प्रस्थान किया।

20 फरवरी, 1920 को जब वे स्वदेश लौटे तो अमृतसर में जलियावाला बाग काण्ड हो चुका था, और सारा राष्ट्र असन्तोष तथा क्षोभ की ज्वाला में जल रहा था। इसी बीच महात्मा गाँधी ने असहयोग आन्दोलन आरम्भ किया तो लालाजी पूर्ण तत्परता के साथ उस संघर्ष में जुट गये। 1920 में ही वे कलकत्ता मेँ आयोजित कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के अध्यक्ष बने। उन दिनों सरकारी शिक्षण संस्थानों के बहिष्कार विदेशी वस्त्रों के त्याग, अदालतों का बहिष्कार, शराब के विरुद्ध आन्दोलन, चरखा और खादी का प्रचार जैसे कार्यक्रमों को कांग्रेस ने अपने हाथ में ले रखा था जिसके कारण जनता में एक नई चेतना का प्रादुर्भाव हो चला था।

इसी समय लालाजी को कारावास का दण्ड मिला, किन्तु खराब स्वास्थ्य के कारण वे जल्दी ही रिहा कर दिये गये। 1924 में लालाजी कांग्रेस के अन्तर्गत ही बनी स्वराज पार्टी में शामिल हो गये और केन्द्रीय धारा सभा (सेंट्रल असेम्बली) के सदस्य चुन लिए गये। जब उनका पं० मोतीलाल नेहरू से कतिपय राजनैतिक प्रश्नों पर मतभेद हो गया तो उन्होंने नेशनलिस्ट पार्टी का गठन किया और फिर असेम्बली में पहुँच गये। उन्होंने स्वामी श्रद्धानन्द तथा पं० मदनमोहन मालवीय के सहयोग से उन्होंने हिन्दू महासभा के कार्य को आगे बढ़ाया।

1925 में उन्हें हिन्दू महासभा के कलकत्ता अधिवेशन क़ा अध्यक्ष भी बनाया गया। ज्ञातव्य है कि उन दिनों हिन्दू महासभा का कोई स्पष्ट राजनैतिक कार्यक्रम नहीं था और वह मुख्य रूप से हिन्दू संगठन, अछूतों- द्वार, शुद्धि जैसे सामाजिक कार्यक्रमों में ही दिलचस्पी लेती थी। इसी कारण कांग्रेस से उसे थोड़ा भीं विरोध नहीं था। यद्यपि संकीर्ण दृष्टि से अनेक राजनैतिक कर्मी लालाजी के हिन्दू महासभा में रुचि लेने से नाराज भी हुए, किन्तु उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की और वे अपने कर्तव्य पालन में ही लगे रहे।
                                                                   
(अखिलेश सिंह ‘चंदेल’, डायरेक्टर, तालुकदार कृषक फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड, मो ० न० – 7068991602)

                                                                     
                                         
                                                               

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