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COP-31 में भारत की ओर से शामिल होंगे CUJ के डॉ. चंद्र शेखर द्विवेदी

रांची: केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड (CUJ), रांची के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। विश्वविद्यालय के डॉ. चंद्र शेखर द्विवेदी को भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक जलवायु सम्मेलन COP-31 में भाग लेने के लिए नामित किया है। उन्हें सम्मेलन के आधिकारिक परिसर (ब्लू जोन) में प्रवेश के लिए पंजीकरण भी मिल गया है। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में उनकी भागीदारी से झारखंड के शैक्षणिक और शोध जगत को वैश्विक स्तर पर पहचान मिलेगी।

COP-31 का आयोजन 9 से 20 नवंबर 2026 तक तुर्किये के अंताल्या शहर में होगा। इस सम्मेलन में दुनिया के विभिन्न देशों के सरकारी प्रतिनिधि, वैज्ञानिक, पर्यावरण विशेषज्ञ, शोधकर्ता और नीति निर्माता शामिल होंगे। सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे और उससे निपटने के उपायों पर चर्चा होगी। इसके अलावा ग्लोबल वार्मिंग, प्राकृतिक आपदाओं, पर्यावरण संरक्षण, जलवायु अनुकूलन, जलवायु वित्त और नई तकनीकों के इस्तेमाल जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा।

हिमालय और तटीय क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन पर कर रहे हैं शोध

डॉ. चंद्र शेखर द्विवेदी का शोध कार्य मुख्य रूप से हिमालयी और तटीय क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने पर केंद्रित है। इन दोनों क्षेत्रों को पर्यावरण और प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है।

हिमालयी क्षेत्रों में उनका शोध ग्लेशियरों के पिघलने, जल संसाधनों में बदलाव, अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं के खतरों से जुड़ा है। वहीं, तटीय क्षेत्रों में वे समुद्र के बढ़ते जलस्तर, समुद्र तटों के कटाव और पर्यावरण में हो रहे बदलावों का अध्ययन कर रहे हैं।

अपने शोध में वे सैटेलाइट तकनीक, रिमोट सेंसिंग, भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) और मशीन लर्निंग जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। इन तकनीकों की मदद से पर्यावरण में हो रहे बदलावों की पहचान, प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी और उनके संभावित खतरों का आकलन किया जाता है। उनका शोध ऐसी पूर्व चेतावनी प्रणालियों को बेहतर बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण है, जिससे समय रहते लोगों को प्राकृतिक आपदाओं के प्रति सतर्क किया जा सके।

डॉ. द्विवेदी का मानना है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल जंगल, पहाड़ और समुद्र तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर आम लोगों के जीवन, रोजगार, खेती, जल संसाधनों और विकास पर भी पड़ता है। इसलिए वैज्ञानिक शोध को आम लोगों की जरूरतों और सरकारी योजनाओं से जोड़ना जरूरी है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर साझा करेंगे शोध अनुभव

COP-31 दुनिया के सामने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों और उनके समाधान पर चर्चा करने का एक महत्वपूर्ण मंच है। यहां विकसित और विकासशील देशों के बीच जलवायु संरक्षण, आर्थिक सहयोग, नई तकनीकों के आदान-प्रदान और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर विचार रखे जाएंगे।

इस सम्मेलन में डॉ. द्विवेदी को अपने शोध अनुभव और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा करने का अवसर मिलेगा। विशेष रूप से हिमालयी और तटीय क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों, प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी और आधुनिक तकनीक के माध्यम से उनके समाधान पर उनके अनुभव उपयोगी हो सकते हैं। उनकी भागीदारी से विश्वविद्यालय के शोध कार्यों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने और दूसरे संस्थानों के साथ सहयोग की नई संभावनाएं भी बन सकती हैं।

कुलपति ने दी बधाई, कहा- विश्वविद्यालय और झारखंड के लिए गौरव की बात

डॉ. चंद्र शेखर द्विवेदी के COP-31 के लिए नामित होने पर केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड के कुलपति प्रो. सारंग मेढेकर ने उन्हें बधाई और शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के महत्वपूर्ण वैश्विक सम्मेलन में विश्वविद्यालय के शिक्षक की भागीदारी पूरे विश्वविद्यालय परिवार और झारखंड के लिए गर्व का विषय है। यह उपलब्धि विश्वविद्यालय में हो रहे गुणवत्तापूर्ण शोध कार्यों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने में सहायक होगी।

डॉ. द्विवेदी ने इस अवसर पर भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि COP-31 जैसे वैश्विक मंच पर भागीदारी उनके लिए महत्वपूर्ण अवसर है। वे अपने शोध अनुभवों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन, हिमालयी एवं तटीय क्षेत्रों की पर्यावरणीय चुनौतियों और प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के उपायों पर होने वाली चर्चा में योगदान देने का प्रयास करेंगे।

डॉ. द्विवेदी की यह उपलब्धि केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड के लिए एक महत्वपूर्ण सम्मान है। इससे न केवल विश्वविद्यालय के शोध कार्यों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा, बल्कि झारखंड के शैक्षणिक और वैज्ञानिक क्षेत्र की उपलब्धियों को भी नई पहचान मिलेगी।

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