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दिवंगत पिता के प्रति अमर्यादित टिप्पणी कांग्रेस की विकृत राजनीतिक मानसिकता का परिचायक : डॉ. प्रदीप वर्मा

खड़गे जी ने अपने बयान से राजनीतिक मर्यादा, भारतीय संस्कार और सार्वजनिक जीवन की गरिमा को किया तार-तार

रांची: भाजपा के राष्ट्रीय मंत्री एवं राज्यसभा सांसद डॉ. प्रदीप वर्मा ने पटना में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा दिए गए कथित अमर्यादित बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे शर्मनाक, दुर्भाग्यपूर्ण और भारतीय राजनीतिक संस्कृति के सर्वथा विपरीत बताया है।
डॉ. वर्मा ने कहा कि राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन विरोध की आड़ में किसी दिवंगत पिता के प्रति अमर्यादित भाषा का प्रयोग करना कहां तक उचित है? कांग्रेस अध्यक्ष जैसे वरिष्ठ पद पर बैठे व्यक्ति से देश राजनीतिक परिपक्वता, संयम और शालीनता की अपेक्षा करता है, लेकिन इस तरह की टिप्पणी ने सार्वजनिक जीवन की गरिमा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

उन्होंने कहा कि बिहार केसरी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह जी की 139वीं जयंती जैसे गरिमामय अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के मंच से यदि किसी दिवंगत पिता के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया है, तो यह केवल संबंधित व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कारों और सामाजिक मूल्यों के प्रति असंवेदनशीलता का भी परिचायक है। हमारी संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है। ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव’ केवल शब्द नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का मूल आधार है।

डॉ. वर्मा ने कहा कि कांग्रेस की राजनीति आज जिस स्तर पर पहुंचती दिखाई दे रही है, वह बेहद चिंताजनक है। वैचारिक विरोध का उत्तर तर्क और तथ्यों से दिया जाना चाहिए, न कि व्यक्तिगत कटाक्ष और अमर्यादित भाषा से। लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सभी को है, लेकिन उस अधिकार के साथ मर्यादा और जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को यह समझना चाहिए कि वरिष्ठता केवल पद या अनुभव से नहीं, बल्कि आचरण और वक्तव्य की गरिमा से भी प्रमाणित होती है।

उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। राजनीतिक चुनौतियों का सामना जनसेवा, स्पष्ट नीतियों और सकारात्मक एजेंडे से किया जाता है, न कि व्यक्तिगत टिप्पणियों के सहारे। जनता सब देख रही है और राजनीतिक नेतृत्व के आचरण का मूल्यांकन भी कर रही है।

डॉ. वर्मा ने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि व्यक्तिगत अपमान और कटु बयानबाजी के माध्यम से वह जनता का विश्वास जीत सकता है। भारत की जनता जागरूक है और लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनादेश का होता है। राजनीतिक अहंकार और अमर्यादित भाषा किसी भी दल की साख को मजबूत नहीं कर सकती।
उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से अपेक्षा की कि वे अपने बयान पर गंभीरता से विचार करें और सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाएं। राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति, पारिवारिक सम्मान और लोकतांत्रिक शिष्टाचार से समझौता स्वीकार्य नहीं है।

डॉ. वर्मा ने कहा कि भारतीय राजनीति में पद की गरिमा, शब्दों की मर्यादा और जनता की भावनाओं का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए। लोकतंत्र में अहंकार नहीं, जनादेश सर्वोपरि है और राजनीतिक बयानबाजी की नहीं, बल्कि आचरण की कसौटी पर ही नेतृत्व की वास्तविक पहचान होती है।

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