राँची: झारखण्ड की समृद्ध जनजातीय एवं लोक संस्कृति से जुड़े प्राचीन करम गीतों, देवलोक-कथाओं, पारंपरिक वाद्यों, करम धुनों, नृत्य-अनुष्ठानों एवं मौखिक परंपराओं के संरक्षण और Audio-Visual Documentation के उद्देश्य से “करम पर्व–लोकधरोहर Audio-Visual प्रतियोगिता–2026” का आज रामकृष्ण मिशन सभागार, मोराबादी, राँची में विधिवत शुभारंभ किया गया।
कार्यक्रम में राँची की महापौर रौशनी खलखो, रामकृष्ण मिशन आश्रम के सचिव स्वामी भावेशानंद जी, आदि संस्कृति मंच के धीरेन्द्र कुमार तथा वरिष्ठ समाजसेवी रूपम झा की गरिमामयी उपस्थिति रही। इस अवसर पर प्रतियोगिता के पोस्टर का लोकार्पण करते हुए झारखण्ड की जीवंत लोक एवं जनजातीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और उसे नई पीढ़ी से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
प्रतियोगिता का उद्देश्य केवल करम गीतों की प्रस्तुति कराना नहीं, बल्कि गाँवों और समुदायों में पीढ़ियों से संरक्षित करम गीत, करम देव एवं देवलोक से जुड़ी कथाएँ, पारंपरिक वाद्य एवं धुन, नृत्य, अनुष्ठान, लोकविश्वास तथा बुजुर्ग ज्ञानधारकों की स्मृतियों को व्यवस्थित Audio-Visual स्वरूप में दस्तावेजीकृत करना है। इसके माध्यम से युवा पीढ़ी को अपने गाँव और समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को खोजने, समझने और रिकॉर्ड करने के लिए प्रेरित किया जाएगा।
प्रतियोगिता सम्पूर्ण झारखण्ड के लिए आयोजित की जा रही है। जनजातीय एवं लोक कलाकार, ग्राम-सांस्कृतिक दल, युवा, विद्यार्थी, शोधार्थी तथा संस्कृति-प्रेमी इसमें ऑनलाइन भाग ले सकेंगे। प्रविष्टियों में सांस्कृतिक प्रामाणिकता, करम गीत एवं कथा, पारंपरिक वाद्य-धुन, नृत्य-अनुष्ठान, ज्ञानधारकों का कथन और Audio-Visual documentation की गुणवत्ता को महत्व दिया जाएगा।
प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार ₹11,000, द्वितीय पुरस्कार ₹7,100 तथा तृतीय पुरस्कार ₹5,100 रखा गया है। इसके अतिरिक्त 10 श्रेष्ठ रचनाओं को ₹1,100 प्रति प्रविष्टि सहभागिता पुरस्कार एवं प्रमाणपत्र प्रदान किया जाएगा। चयनित सामग्री को संबंधित कलाकारों एवं समुदाय की सहमति के आधार पर “लोकधरोहर” डिजिटल अभिलेखागार में संरक्षित करने का प्रयास भी किया जाएगा।
प्रतियोगिता के लिए वीडियो भेजने की अंतिम तिथि 11 अक्टूबर 2026 निर्धारित की गई है। प्राप्त प्रविष्टियों की समीक्षा एवं चयन के बाद 31 अक्टूबर 2026, शनिवार को राँची में राज्यस्तरीय समापन एवं पुरस्कार समारोह आयोजित किया जाएगा।
इस अवसर पर आयोजकों ने झारखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों के युवाओं, कलाकारों, सांस्कृतिक संगठनों और पारंपरिक ज्ञानधारकों से आह्वान किया कि वे अपने गाँवों में आज भी जीवित प्राचीन करम परंपराओं को खोजें और उनका प्रामाणिक दस्तावेजीकरण कर प्रतियोगिता में भेजें।
“हमारा करम — हमारी संस्कृति, हमारी धरोहर” के संदेश के साथ इस अभियान का लक्ष्य करम की जीवंत सांस्कृतिक स्मृतियों को वर्तमान से जोड़ते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करना है।