NEWS7AIR

वी. राजारमन: वह शिक्षक, जिन्होंने भारत को ‘IT सुपरपावर’ बनाया

यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जिनका नाम शायद इतिहास की मुख्यधारा की किताबों में दर्ज न हो, लेकिन आज भारत का हर सॉफ़्टवेयर इंजीनियर अनजाने में उनका ऋणी है।

1933 में तमिलनाडु के इरोड में जन्मे वी. राजारमन एक विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से फिजिक्स और IISc बैंगलोर से इंजीनियरिंग करने के बाद, वे सरकारी स्कॉलरशिप पर MIT (अमेरिका) गए। 1961 में अपनी PhD पूरी करने के बाद, जब दुनिया भर की बड़ी कंपनियाँ उन्हें ऊँचे पैकेजों का लालच दे रही थीं, तब राजारमन ने एक साहसी फैसला लिया—अपनी मातृभूमि लौटने का।

बैलगाड़ी पर आया भविष्य

1963 की एक सुबह, IIT कानपुर के बाहर एक अजीबोगरीब दृश्य था। एक विशालकाय ‘IBM 1620’ कंप्यूटर बैलगाड़ी पर लदकर आया था। वह मशीन इतनी बड़ी थी कि उसे कमरे के भीतर ले जाने के लिए कॉलेज की एक दीवार तक तोड़नी पड़ी। जहाँ सब लोग उस मशीन की तकनीक को देख रहे थे, वहीं राजारमन एक दूरगामी विजन देख रहे थे। उन्होंने सोचा, “क्या होगा अगर भारत इस मशीन को सिर्फ इस्तेमाल न करे, बल्कि इसे एक विषय के तौर पर पढ़ाना शुरू करे?”

सपनों का पहला बैच

1965 में, उन्होंने IIT कानपुर में भारत का पहला कंप्यूटर साइंस प्रोग्राम शुरू किया। उनके पहले बैच में सिर्फ 20 छात्र थे, जिनमें से एक छात्र का नाम नारायण मूर्ति था, जिन्होंने आगे चलकर ‘इन्फोसिस’ जैसी दिग्गज कंपनी खड़ी की।

डिजिटल क्रांति की नींव

राजारमन ने केवल छात्रों को पढ़ाया ही नहीं, बल्कि ‘MCA’ प्रोग्राम का खाका तैयार किया, जिससे लाखों मध्यमवर्गीय युवाओं के लिए IT सेक्टर के दरवाजे खुले। इतना ही नहीं, जब भारत को अपने सुपरकंप्यूटर की जरूरत महसूस हुई, तो उन्होंने उस कमेटी का नेतृत्व किया जिसने ‘C-DAC’ की स्थापना की।

8 नवंबर, 2025 को 92 वर्ष की आयु में इस महानायक ने दुनिया को अलविदा कह दिया। आज भारत की जिस 250 अरब डॉलर की IT इंडस्ट्री पर हमें गर्व है, उसका पहला बीज राजारमन जी ने उसी छोटे से क्लासरूम में बोया था।

वे भले ही सुर्खियों में न रहे हों, लेकिन डिजिटल इंडिया की हर ‘लाइन ऑफ कोड’ में उनकी मेहनत और दूरदर्शिता आज भी जीवित है।

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.