यह कहानी भारत के उस दौर की है, जब राजनीति सेवा का माध्यम थी, सत्ता का नहीं। पी. ककन (P. Kakkan) जैसे सादगी पसंद नेता उस समय की शान हुआ करते थे। प्रस्तुत है उनकी जीवन की एक सच्ची घटना पर आधारित कहानी:कहाँ गए वो लोग
कहाँ गए वो लोग
स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों की बात है। तमिलनाडु में श्री कामराज मुख्यमंत्री थे और उनके मंत्रिमंडल में एक ऐसे व्यक्ति थे जिनकी ईमानदारी के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं—श्री पी. ककन। वे गृह, लोक निर्माण, कृषि और पुलिस जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री थे, लेकिन उनका रहन-सहन किसी साधारण कार्यकर्ता से भी सादा था। वे दौरे पर भी अपने कपड़े खुद धोया करते थे।
एक बार मंत्री जी सरकारी काम से त्रिची (Trichy) गए हुए थे। काम निपटाते-निपटाते देर हो गई और जब वे रेलवे स्टेशन पहुंचे, तो उनकी ट्रेन छूट चुकी थी। अगली ट्रेन सुबह आनी थी।आज के दौर का कोई छोटा नेता भी होता, तो स्टेशन मास्टर के कमरे में हंगामा मच जाता या सर्किट हाउस से गाड़ियाँ दौड़ पड़तीं। लेकिन ककन जी ने किसी को परेशान नहीं किया। उन्होंने न रेलवे अधिकारियों को अपनी पहचान बताई और न ही किसी वीआईपी सुविधा की मांग की। चुपचाप स्टेशन के एक साधारण से बेंच पर अपना अंगोछा बिछाया और सो गए।
आधी रात का वक्त था। रेलवे पुलिस के सिपाही गश्त पर थे। एक पुलिसवाले ने बेंच पर सोए व्यक्ति को देखा और हाथ में पकड़ी लाठी से उन्हें जगाते हुए कड़ककर कहा, “ऐ! यहाँ क्यों सोए हो? उठो यहाँ से, बाहर जाओ। यहाँ सोना मना है। “मंत्री जी अपनी नींद से जागे, उन्होंने कोई गुस्सा नहीं दिखाया। बड़ी ही विनम्रता से बोले, “जी सर, मेरा नाम ककन है। मैं गृह और पुलिस विभाग का मंत्री हूँ। सुबह की ट्रेन पकड़नी है, तब तक यहीं रुक गया था।”
यह सुनते ही पुलिसवालों के पैरों तले जमीन खिसक गई। वे थर-थर कांपने लगे। उन्होंने तुरंत हाथ जोड़कर माफी मांगी, “सर! हमें क्षमा कर दीजिए, हम आपको पहचान नहीं पाए। चलिए, हम आपके लिए ‘फर्स्ट क्लास’ वेटिंग रूम खुलवाते हैं, आप वहाँ आराम कीजिए। “ककन जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “नहीं भाइयों, इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। मेरे लिए यह बेंच ही काफी है।” और वे वापस उसी बेंच पर सो गए। पूरी रात पुलिसवाले अपने ही विभाग के मंत्री की सुरक्षा में स्टेशन पर तैनात रहे।आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो दिल यही पूछता है कि वे लोग और वैसी सादगी आखिर कहाँ चली गई?