आरएसएस के यूजीसी भेदभाव-विरोधी विनियमों को असंतुलित बताने वाले बयान का स्वागत : अधिवक्ता संजीव राजपूत
नई दिल्ली:अधिवक्ता संजीव राजपूत (अधिवक्ता, सामाजिक कार्यकर्ता एवं मीडिया पैनलिस्ट) ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के भेदभाव-विरोधी विनियमों को असंतुलित बताते हुए केंद्र सरकार से उनमें निष्पक्षता, न्यायसंगत दृष्टिकोण एवं सामाजिक सद्भाव सुनिश्चित करने की अपील का स्वागत किया है।
उन्होंने कहा कि देर आए, दुरुस्त आए। आरएसएस जैसी महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था द्वारा इस विषय पर अपनी चिंता व्यक्त करना स्वागतयोग्य है। यह स्पष्ट करता है कि यूजीसी विनियमों को लेकर सामान्य एवं अनारक्षित वर्ग द्वारा उठाई जा रही चिंताएं निराधार नहीं हैं, बल्कि उनके पीछे निष्पक्षता, समानता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े वास्तविक प्रश्न हैं।
अधिवक्ता संजीव राजपूत ने कहा कि अब केवल एक संगठन या समुदाय नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक एवं राष्ट्रीय स्तर के संगठन भी इस विषय पर अपनी आवाज उठा रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि सामान्य वर्ग की मांगों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, न्याय और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार प्रदान करता है। इसलिए किसी भी कानून अथवा विनियम का निर्माण करते समय सभी वर्गों के अधिकारों और हितों का संवैधानिक संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है।
उन्होंने आगे कहा कि एक बात अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है कि जो समाज अपने अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठाता, उसके अधिकारों की अनदेखी होने लगती है और उसकी समस्याओं को सुनने वाला भी कोई नहीं होता। लंबे समय तक सामान्य वर्ग की समस्याएं और मांगें अपेक्षित राजनीतिक एवं सामाजिक मंचों पर पर्याप्त स्थान नहीं पा सकीं। लेकिन अब सामान्य वर्ग अपने अधिकारों, सम्मान, समान अवसर और न्यायसंगत नीतियों के लिए मुखर हो रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह संघर्ष किसी अन्य वर्ग के अधिकारों के विरुद्ध नहीं, बल्कि अपने संवैधानिक अधिकारों, निष्पक्षता और समान अवसरों की मांग के लिए है।
अंत में अधिवक्ता संजीव राजपूत ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि यूजीसी के किसी भी विनियम या नीति में किसी वर्ग के साथ अन्याय अथवा भेदभाव की गुंजाइश न रहे। शिक्षा संस्थानों में वास्तविक भेदभाव के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई हो, लेकिन साथ ही प्रत्येक विद्यार्थी को निष्पक्ष सुनवाई, समान अवसर और न्यायपूर्ण प्रक्रिया की संवैधानिक गारंटी भी मिले।
उनका संदेश स्पष्ट है—सामाजिक न्याय तभी सार्थक होगा, जब न्याय सभी के लिए समान हो और किसी भी वर्ग की आवाज अनसुनी न की जाए।