हेमंत सोरेन को झटका, झारखंड हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग ट्रायल पर रोक लगाने से किया इनकार; कहा—”जमीन हड़पना मुख्यमंत्री का आधिकारिक कर्तव्य नहीं”
Ranchi: झारखंड उच्च न्यायालय ने निचली अदालत की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है, जिससे विशेष पीएमएलए (PMLA) अदालत के लिए पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ आरोप तय (Framing of Charges) करने की कार्यवाही आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है।अपना फैसला सुनाते हुए माननीय न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 197(1) के तहत मिलने वाली सुरक्षा लोक सेवकों को ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए दी जाती है, यह आपराधिक कृत्यों के लिए कोई पूर्ण छूट (Blanket Immunity) नहीं है।
अदालत ने यह स्थापित किया कि कोई विशिष्ट कृत्य “आधिकारिक कर्तव्य” के दायरे में आता है या नहीं, यह मुकदमे (Trial) के दौरान तय होने वाला विषय है, इसलिए केवल औपचारिक मंजूरी पत्र न होने को भ्रष्टाचार की कार्यवाही को रोकने का जरिया नहीं बनाया जा सकता।अदालत की मुख्य टिप्पणियांकोई आधिकारिक संबंध नहीं: अदालत ने कहा कि आदिवासियों की 8.86 एकड़ भूमि का अवैध अधिग्रहण, कब्जा और उसे छिपाना, मुख्यमंत्री पद के आधिकारिक कर्तव्यों या उनके कार्यक्षेत्र से किसी भी तरह से तर्कसंगत रूप से जुड़ा हुआ नहीं है।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा जब्त की गई 44 पन्नों के आंतरिक राजस्व दस्तावेजों वाली “CMO URGENT” फाइल सहित अन्य प्रथम दृष्टया (Prima Facie) सबूत, स्पष्ट रूप से स्थानीय अंचल अधिकारियों को प्रभावित करने और सरकारी रजिस्टरों में हेरफेर करने के लिए संवैधानिक शक्ति के दुरुपयोग की ओर इशारा करते हैं।मुकदमा जारी रहेगा: सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि केवल मंजूरी का इंतजार होने के आधार पर पूरा मुकदमा रद्द नहीं हो जाता, और आपराधिक मुकदमे के किसी भी चरण में कानूनी मंजूरी पर विचार किया जा सकता है या इसे प्राप्त किया जा सकता है। इसी के साथ, अदालत ने अंतरवर्ती आवेदन (I.A. No. 12139 of 2026) को खारिज कर दिया और विशेष न्यायाधीश, पीएमएलए, रांची को कानून के अनुसार सख्ती से आगे बढ़ने का निर्देश दिया।