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हरमू नदी पर ‘दिखावे’ की कार्रवाई: 100 करोड़ फूंकने के बाद भी नाला बनी नदी, गरीबों की झोपड़ियों पर चला बुलडोज़र

राँची। हरमू नदी की जमीन पर किए गए अवैध कब्जों के खिलाफ जिला प्रशासन द्वारा की गई हालिया कार्रवाई पूरी तरह से एक दिखावा (eyewash) प्रतीत होती है, क्योंकि रांची नगर निगम (RMC) पहले ही 100 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने के बाद इस ऐतिहासिक सदानीरा नदी को एक गंदे नाले में तब्दील कर चुका है। करोड़ों के तथाकथित ‘कायाकल्प प्रोजेक्ट’ के बावजूद नदी का दम घुटता रहा, और अब अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए प्रशासन ने छोटे अतिक्रमणकारियों को निशाना बनाया है।

इस अभियान के तहत अरगोड़ा अंचल कार्यालय और रांची नगर निगम (RMC) की संयुक्त टीम ने रेसालदार नगर और डोरंडा क्षेत्र में एक बड़ा अभियान चलाकर 54 अवैध अतिक्रमणों को हटा दिया। इस दौरान भारी संख्या में पुलिस बल की मौजूदगी में अवैध रूप से बने कच्चे-पक्के मकानों और गरीब तबके की झोपड़ियों को बुलडोज़र से ध्वस्त कर दिया गया। अरगोड़ा अंचल से मिली जानकारी के अनुसार, इस दंडात्मक कार्रवाई से पहले सभी चिन्हित कब्जाधारियों को आधिकारिक नोटिस जारी कर निर्धारित समय के भीतर जमीन खाली करने का निर्देश दिया गया था।

बुलडोज़र एक्शन की मुख्य बातें

* कुल हटाए गए अतिक्रमण: 54 अवैध निर्माण और झोपड़ियां
* प्रभावित क्षेत्र: रेसालदार नगर, डोरंडा और अरगोड़ा नदी के कैचमेंट एरिया
* संयुक्त टीम: अरगोड़ा अंचल कार्यालय और रांची नगर निगम (RMC)
* प्रशासनिक रुख: भविष्य में दोबारा कब्जा करने पर सख्त कानूनी कार्रवाई की चेतावनी

100 करोड़ का ‘सफेद हाथी’ और हाई कोर्ट की फटकार

स्थानीय नागरिकों और पर्यावरणविदों का आरोप है कि जिला प्रशासन की यह कार्रवाई केवल झारखंड हाई कोर्ट की संभावित अवमानना की कार्रवाई से बचने के लिए की गई है। सालों पहले हरमू नदी के संरक्षण और सुंदरीकरण के नाम पर 100 करोड़ रुपये से अधिक का बजट पानी की तरह बहाया गया था। नदी के दोनों किनारों पर कंक्रीट की दीवारें खड़ी कर दी गईं, जिससे पानी के प्राकृतिक स्रोत ही बंद हो गए। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) सुचारू रूप से काम नहीं कर पाए और पूरे शहर का गंदा पानी बिना ट्रीटमेंट के नदी में गिरता रहा। नतीजतन, जिस नदी को पुनर्जीवित करना था, वह आज एक बड़े नाले के रूप में तब्दील हो चुकी है।

प्रशासनिक लापरवाही का आलम यह है कि रसूखदारों द्वारा नदी के बफर जोन में बनाई गई बहुमंजिला इमारतों और बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को छूने की हिम्मत अधिकारी नहीं दिखा पाते हैं। इसके उलट, केवल झोपड़ियों और अस्थायी शेडों को तोड़कर आंकड़ों की बाजीगरी की जाती है, ताकि फाइलों में ‘अतिक्रमण मुक्त’ अभियान को सफल दिखाया जा सके।

अतिक्रमण हटाने के बाद फिर वही स्थिति

अरगोड़ा अंचल के अधिकारियों का कहना है कि मानसून के दौरान जलभराव और बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए नदी के कैचमेंट एरिया को साफ करना बेहद जरूरी था। लेकिन धरातल की सच्चाई यह है कि नगर निगम द्वारा अभियान चलाकर अतिक्रमण हटाने के कुछ ही दिनों बाद अवैध कब्जाधारी फिर से वापस लौट आते हैं। स्थानीय थानों को इन जमीनों की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई है, लेकिन ठोस इच्छाशक्ति के अभाव में यह अभियान केवल कागजी बनकर रह गया है। जब तक नदी को प्रदूषित करने वाले बड़े नालों को नहीं रोका जाता और कंक्रीट के बड़े अवैध निर्माणों पर बुलडोज़र नहीं चलता, तब तक गरीबों के आशियाने उजाड़ने वाले ऐसे अभियान महज एक ढोंग ही साबित होंगे।

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