रांची: झारखंड में बीते कुछ वर्षों में सुरक्षा व्यवस्था और ग्रामीण विकास के मोर्चे पर बड़े बदलाव देखे गए हैं। राज्य सरकार और केंद्रीय बलों के संयुक्त प्रयासों से संचालित नक्सल मुक्ति अभियान ने नक्सलियों के गढ़ माने जाने वाले इलाकों की तस्वीर बदल दी है। बूढ़ा पहाड़, पारसनाथ और झुमरा जैसे दुर्गम क्षेत्रों, जो कभी नक्सलियों के ‘सेफ हेवन’ माने जाते थे, आज सुरक्षा बलों के नियंत्रण में हैं। हालांकि, क्या झारखंड पूरी तरह से नक्सल मुक्त हो चुका है? ग्राउंड जीरो की हकीकत इस अभियान की सफलता और आगामी चुनौतियों दोनों की ओर इशारा करती है।
सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, हालिया वर्षों में ‘ऑपरेशन ऑक्टोपस’, ‘ऑपरेशन डबल बुल’ और ‘ऑपरेशन चक्रव्यूह’ जैसे आक्रामक अभियानों ने नक्सली संगठनों की कमर तोड़ दी है। सबसे बड़ी कामयाबी बूढ़ा पहाड़ को नक्सलियों के कब्जे से मुक्त कराना रही। पिछले तीन दशकों से इस इलाके में पुलिस कदम रखने से भी कतराती थी। आज वहां सुरक्षा बलों के स्थायी कैंप (फॉरवर्ड पोस्ट) स्थापित हो चुके हैं, जिससे नक्सलियों की सप्लाई लाइन और मूवमेंट पूरी तरह ठप हो गई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, हिंसा की घटनाओं में 70 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है।
झारखंड सरकार की पुनर्वास एवं आत्मसमर्पण नीति (नई दिशा) इस अभियान का एक बेहद कारगर हथियार साबित हुई है। नक्सलियों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए न केवल नकद पुरस्कार दिए जा रहे हैं, बल्कि उनके परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य और जमीन भी मुहैया कराई जा रही है। इस नीति से प्रभावित होकर पिछले कुछ सालों में कई इनामी जोनल कमांडर और सब-जोनल कमांडरों ने हथियार डाले हैं। शीर्ष नेतृत्व के जेल जाने या आत्मसमर्पण करने से नक्सली संगठनों में भारी बिखराव देखा गया है।
सरकार ने यह समझा है कि नक्सलवाद को सिर्फ बंदूक के दम पर खत्म नहीं किया जा सकता। इसलिए, जिन इलाकों से नक्सलियों को खदेड़ा गया, वहां तुरंत ‘विकास का पहिया’ घुमाया गया। सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है, मोबाइल टावर लगाए जा रहे हैं और सरकारी राशन को सुदूर गांवों तक पहुँचाया जा रहा है। ‘आपकी योजना, आपकी सरकार, आपके द्वार’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए प्रशासन सीधे उन आदिवासियों तक पहुँच रहा है, जिन्हें नक्सली गुमराह करते थे।
चुनौतियां अभी भी बाकी हैं
इस अभियान की भारी सफलता के बावजूद, दावों और हकीकत के बीच कुछ चुनौतियां अब भी खड़ी हैं। भाकपा (मावादी) के शीर्ष कैडर अभी भी छत्तीसगढ़ और ओडिशा के सीमावर्ती इलाकों का फायदा उठाकर झारखंड में घुसपैठ की कोशिश करते हैं। इसके अलावा, टीपीसी (तृतीय प्रस्तुति कमेटी) और पीएलएफआई (पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया) जैसे छोटे उग्रवादी संगठन रंगदारी और लेवी (अवैध वसूली) के लिए अब भी सक्रिय हैं। कोयला और बालू डंपिंग यार्डों में इनकी धमक यदा-कदा देखने को मिल जाती है।
झारखंड सरकार का नक्सल मुक्ति अभियान काफी हद तक कारगर साबित हुआ है। आज राज्य के अधिकांश जिले नक्सल मुक्त होने की राह पर हैं। लेकिन इस मोर्चे पर मिली बढ़त को बनाए रखने के लिए सरकार को न केवल सुरक्षा बलों की तैनाती जारी रखनी होगी, बल्कि रोजगार और शिक्षा के बुनियादी ढांचे को और मजबूत करना होगा, ताकि लाल आतंक दोबारा सिर न उठा सके।