झारखंड के गुमला जिले में स्थित टांगीनाथ धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि पौराणिक कथाओं और वैज्ञानिक रहस्यों का अद्भुत संगम है। पहाड़ियों के बीच बसा यह स्थान सदियों से श्रद्धालुओं और इतिहासकारों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है।
1. पौराणिक पृष्ठभूमि: परशुराम का पश्चाताप
इस स्थान का नाम ‘टांगी’ (फरसा) पर पड़ा है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान परशुराम को सीता स्वयंवर में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के असली स्वरूप का ज्ञान हुआ, तो उन्हें अपने कठोर वचनों और क्रोध पर बहुत ग्लानि हुई। वे शिव की उपासना के लिए गुमला के वनों में आए। यहीं उन्होंने अपना दिव्य अस्त्र, फरसा, जमीन में गाड़ दिया और तपस्या में लीन हो गए।
2. विज्ञान को चुनौती देता ‘अक्षय लोहा’
धाम के बीचों-बीच लगा विशाल लोहे का फरसा (त्रिशूल) एक चमत्कार से कम नहीं है।
* जंग मुक्त: यह हजारों वर्षों से खुले आसमान के नीचे खड़ा है, लेकिन इस पर आज तक जंग का एक भी दाग नहीं लगा।
* अथाह गहराई: कहा जाता है कि कुछ शोधकर्ताओं ने इसकी जड़ जानने के लिए जमीन के अंदर गहरी खुदाई की थी, लेकिन वे इसके अंतिम सिरे तक नहीं पहुँच पाए।
3. लोहार समुदाय से जुड़ा प्राचीन श्राप
स्थानीय जनजातीय मान्यताओं के अनुसार, एक बार लोहार समुदाय के कुछ लोगों ने इस फरसे को काटकर लोहा निकालने का प्रयास किया था। कथा है कि जैसे ही उन्होंने फरसे पर प्रहार किया, वे और उनके परिवार के सदस्य गंभीर बीमारियों और अकाल मृत्यु का ग्रास बनने लगे। इस डर के कारण, आज भी उस क्षेत्र के 12 कोस के दायरे में लोहार समुदाय के लोग बसने से कतराते हैं।
4. प्राचीन मूर्तिकला का खुला संग्रहालय
टांगीनाथ की पहाड़ी पर कदम रखते ही आपको चारों ओर प्राचीन शिवलिंग और पत्थर की मूर्तियाँ बिखरी हुई मिलेंगी।
* यहाँ लगभग सैकड़ों शिवलिंग मौजूद हैं, जो विभिन्न आकारों और कलाकृतियों में हैं।
* यहाँ भगवान विष्णु, सूर्य देव और माँ दुर्गा की अत्यंत सुंदर मूर्तियाँ हैं, जिन्हें 7वीं से 9वीं शताब्दी के बीच का माना जाता है।
5. धार्मिक एवं पर्यटन महत्व
महाशिवरात्रि और सावन के महीने में यहाँ भक्तों का ताँता लगा रहता है। प्रकृति की गोद में स्थित होने के कारण यह स्थान आध्यात्मिक शांति और शांतिपूर्ण वातावरण चाहने वाले पर्यटकों के लिए स्वर्ग के समान है।
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