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नरक चतुर्दशी की अद्भुत कथा: जब माता सत्यभामा ने किया नरकासुर का वध

द्वापर युग की बात है। प्राग्ज्योतिषपुर में नरकासुर नाम का एक महाप्रतापी असुर राजा था। वह कोई साधारण असुर नहीं था। वह स्वयं भगवान वराह और माता भूदेवी का पुत्र था।

जन्म के समय भूदेवी ने भगवान विष्णु से वरदान माँगा था कि मेरे पुत्र की मृत्यु केवल मेरे ही हाथों हो। भगवान ने तथास्तु कह दिया। इसी वरदान के कारण नरकासुर को कोई देवता, गंधर्व या मानव मार नहीं सकता था।

वरदान पाकर नरकासुर अहंकारी हो गया। उसने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया। उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर इंद्र की माता अदिति के कुंडल छीन लिए, वरुण का छत्र हड़प लिया और 16,100 कन्याओं को बंदी बनाकर अपने महल में कैद कर लिया।

देवता त्राहि-त्राहि करने लगे। तब इंद्र भगवान श्रीकृष्ण के पास गए और प्रार्थना की — प्रभु, नरकासुर का वध कीजिए।

श्रीकृष्ण गरुड़ पर सवार होकर प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचे। साथ में थीं उनकी पत्नी माता सत्यभामा।

युद्ध शुरू हुआ। नरकासुर की विशाल सेना और उसके भयंकर अस्त्रों के सामने श्रीकृष्ण ने भीषण युद्ध किया।

तभी एक अद्भुत घटना घटी। नरकासुर ने श्रीकृष्ण पर एक शक्तिशाली त्रिशूल चलाया, जिससे श्रीकृष्ण मूर्छित से हो गए। यह देखकर सत्यभामा क्रोध से भर उठीं।

सत्यभामा ने धनुष उठाया और नरकासुर पर प्रहार करना शुरू कर दिया।

दरअसल, सत्यभामा कोई और नहीं, स्वयं माता भूदेवी का ही अवतार थीं। नरकासुर की माता ही उसके सामने थीं। नियति का चक्र पूरा हो रहा था।

अंत में सत्यभामा ने अपने बाण से नरकासुर का वध कर दिया।

मरते समय नरकासुर को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने भगवान श्रीकृष्ण से वरदान माँगा — प्रभु, जिस दिन मेरी मृत्यु हुई है, उस दिन लोग दीप जलाकर खुशियाँ मनाएँ और मेरी मृत्यु को उत्सव की तरह याद किया जाए।

भगवान ने उसे वरदान दिया। तभी से कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को *नरक चतुर्दशी* के रूप में मनाया जाता है। इसे छोटी दिवाली भी कहते हैं।

इस दिन लोग सुबह उठकर अभ्यंग स्नान करते हैं, दीप जलाते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाते हैं।

*कथा का संदेश: अहंकार कितना भी बड़ा क्यों न हो, अंत में उसका नाश माँ की शक्ति और धर्म के हाथों ही होता है।

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