NEWS7AIR

कलम, क्रांति और कैंपस: क्या दिशाहीन हो रहे हैं आधुनिक छात्र आंदोलन?

विश्वविद्यालय केवल उच्च शिक्षा के केंद्र नहीं होते, बल्कि वे समाज की सामूहिक चेतना को आकार देने वाली सबसे जीवंत नर्सरी भी हैं। भारत के इतिहास पर नजर डालें तो स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष से लेकर आपातकाल के दौर तक, छात्र आंदोलनों ने देश की राजनीतिक और सामाजिक दिशा को बदलने में हमेशा एक निर्णायक भूमिका निभाई है। युवा ऊर्जा जब भी किसी ठोस सिद्धांत के साथ जुड़ती है, तो वह सत्ता के शीर्ष को भी हिलाने का माद्दा रखती है। लेकिन बदलते समय और वैश्वीकरण के इस दौर में छात्र आंदोलनों के मूल स्वरूप, उनकी प्राथमिकताओं और उनकी कार्यप्रणाली में एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिला है। आज यह सवाल पूरी तरह से प्रासंगिक और लाजिमी हो चुका है कि क्या आधुनिक समय के छात्र आंदोलन वास्तव में समाज में कोई सकारात्मक या रचनात्मक बदलाव ला रहे हैं, या फिर वे केवल मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के हाथों के मोहरे बनकर रह गए हैं।

इस विषय का सकारात्मक पक्ष यह है कि छात्र आंदोलन आज भी लोकतंत्र की सबसे मुखर और निर्भीक आवाज माने जाते हैं। जब भी देश में मुख्यधारा का मीडिया, बुद्धिजीवी वर्ग या विपक्षी दल किसी मुद्दे पर कमजोर पड़ते हैं, तब विश्वविद्यालयों के कैंपस से उठी आवाजें ही सत्ता को आईना दिखाने और उसे जवाबदेह बनाने का काम करती हैं। ये आंदोलन छात्रों के भीतर नागरिक जिम्मेदारी, सामाजिक न्याय की समझ और नेतृत्व क्षमता को विकसित करने का एक बेहतरीन माध्यम बनते हैं। फीस वृद्धि, छात्रवृत्ति में कटौती, दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली या प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ जब छात्र एकजुट होते हैं, तो वे एक मजबूत सुरक्षा कवच का निर्माण करते हैं जो आम छात्रों के अधिकारों की रक्षा करता है। इसके अलावा, जातिवाद, लैंगिक असमानता और पर्यावरण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी छात्र समुदाय अक्सर समाज को एक नई दृष्टि और जागरूकता देने का प्रयास करता है।

इसके विपरीत, यदि इस सिक्के के दूसरे पहलू को देखा जाए, तो वर्तमान समय में छात्र आंदोलनों की विश्वसनीयता पर कई गंभीर और जायज सवाल भी उठ रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि आज के अधिकांश बड़े छात्र संगठन स्वतंत्र रूप से काम करने के बजाय मुख्यधारा के राजनीतिक दलों की ‘युवा विंग’ बनकर रह गए हैं। इसके कारण कैंपस की वास्तविक और बुनियादी समस्याएं जैसे कि बेहतर शिक्षा, शोध की सुविधाएं और रोजगार के अवसर कहीं पीछे छूट जाते हैं, और राष्ट्रीय राजनीति का नफा-नुकसान कैंपस पर हावी हो जाता है। इसके अलावा, लगातार होने वाले धरनों, प्रदर्शनों और तालाबंदी के कारण अकादमिक कैलेंडर पूरी तरह से बिगड़ जाता है, जिससे उन सामान्य छात्रों का भारी नुकसान होता है जो एक सीमित समय और बजट के भीतर केवल अपनी पढ़ाई पूरी करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय आते हैं। वैचारिक मतभेदों का हिंसक झड़पों में बदल जाना और कैंपस में डर का माहौल पैदा होना भी इन आंदोलनों की एक बड़ी कमजोरी बन चुका है, जहाँ स्वस्थ बहस की जगह कट्टरता ले लेती है।

अंततः, एक संतुलित निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि छात्र आंदोलन लोकतंत्र की रीढ़ हैं और कैंपस में असहमति की आवाज को दबाया नहीं जाना चाहिए, बशर्ते वे आंदोलन अपनी वैचारिक स्वतंत्रता को हर हाल में बनाए रखें। छात्रों को स्वयं यह आत्ममंथन करना होगा कि उनका प्राथमिक और मुख्य उद्देश्य ज्ञान अर्जन, बौद्धिक विकास और रचनात्मक सुधार होना चाहिए, न कि किसी बाहरी राजनीतिक दल के छिपे हुए एजेंडे को आगे बढ़ाना। आंदोलनों का तरीका हिंसक, आक्रामक या दूसरों की पढ़ाई में बाधक होने के बजाय हमेशा तार्किक संवाद, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और आपसी विमर्श पर आधारित होना चाहिए। जब विश्वविद्यालयों के भीतर अधिकारों की इस लड़ाई के साथ-साथ कर्तव्यों और अकादमिक मर्यादाओं का भी बराबर सम्मान किया जाएगा, तभी ये छात्र आंदोलन देश को एक सही, स्वस्थ और सकारात्मक दिशा देने में सफल हो पाएंगे।

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.