NEWS7AIR

पुणे में ‘भारत भारती’ का पांचवां राष्ट्रीय अधिवेशन संपन्न, विज्ञान, सनातन संस्कृति और अखंडता का अनूठा संगम

पुणे: राष्ट्रीय एकता और अखंडता को समर्पित संस्था “भारत भारती” का पांचवां त्रिदिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन 28 जुलाई 2026 को पुणे के नाजोश्री जैन भवन में गरिमामय माहौल में संपन्न हो गया। 26 जुलाई से शुरू हुए इस तीन दिवसीय भव्य आयोजन में देश के कोने-कोने से—कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप (संपूर्ण पूर्वोत्तर) तक—24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 400 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

इस अधिवेशन की खास बात यह रही कि इसमें पहली बार लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड के प्रतिनिधियों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। झारखंड से प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष अनिरुद्ध सिंह के नेतृत्व में 14 सदस्यीय दल ने भागीदारी की, जिसमें गुमला जिले से जिला संयोजक दामोदर कसेरा, सह-संयोजक सुरेश सिंह, वीर नारी (शहीद की पत्नी) मिला उरांव, मुखिया गौरी किंडो और पुष्पा देवी शामिल थीं। इनके अलावा रांची से तीन और जमशेदपुर से भारत भारती के प्रदेश सचिव सुशील कुमार सिंह और उपाध्यक्ष राजीव रंजन सहित छह प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया।

अधिवेशन का भव्य उद्घाटन 26 जुलाई को मुख्य अतिथि और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एस. सोमनाथ ने दीप प्रज्वलित कर किया, जिन्होंने चंद्रयान को चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतारकर दुनिया भर में भारत का मान बढ़ाया था। अपने संबोधन में डॉ. सोमनाथ ने आधुनिक विज्ञान और भारतीय सनातन धर्म के अगाध ज्ञान की वैज्ञानिकता के बीच अद्भुत तालमेल पर प्रकाश डाला। उन्होंने ऋग्वेद का उदाहरण देते हुए कहा कि विज्ञान के सारे रहस्य हमारे देश के प्राचीन पौराणिक और वैदिक ज्ञान में छिपे हुए हैं। उन्होंने पूरा भरोसा जताते हुए कहा कि वर्तमान सरकार की बेहतरीन नीतियों के कारण भारत, जिसे कभी ‘विश्व-गुरु’ कहा जाता था, अगले 20 वर्षों के भीतर निश्चित रूप से उस गौरवशाली स्थान को फिर से हासिल कर लेगा।
देश आज विकास के साथ-साथ अपनी विरासत को संभालते हुए हर क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है और हमें अपनी परंपराओं व संस्कृति को अक्षुण्ण रखने की आवश्यकता है।

चंद्रयान मिशन के संघर्ष को याद करते हुए उन्होंने कहा कि पिछले मिशन की असफलता से वैज्ञानिकों में आत्मविश्वास की कमी हो गई थी और वे संशय में थे, लेकिन मुझे पूरा विश्वास था कि चंद्रयान सफलतापूर्वक उतरेगा और मैं बस उस पल का साक्षी बनना चाहता था। मैंने चंद्रयान को ठीक वैसे ही उतरते देखा जैसा मैंने अपने मन में सोचा था। यह मेरे जीवन की एक अद्भुत घटना थी और ईश्वर ने मुझे पहले ही सफलता का संदेश दे दिया था। उन्होंने चुटकी लेते हुए यह भी कहा कि हमने अपना अंतरिक्ष यान उसी चांद पर उतारा है जो पाकिस्तान के झंडे पर चमकता है। उद्घाटन सत्र के बाद पहली शाम महाराष्ट्र की अनूठी संस्कृति के रंग बिखरे, जहां गीत, संगीत और नृत्य की मनोहारी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

अधिवेशन के दूसरे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सह-सरकार्यवाह श्री रामदत्त चक्रधर मुख्य अतिथि और मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। उन्होंने सनातन हिंदू-भारतीय संस्कृति में निहित एकता के कई उदाहरण देते हुए इसे और मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हिंदू सनातन का प्रतीक है, भारतीयता हिंदू का प्रतीक है और राष्ट्रवाद भारतीयता का प्रतीक है। जो कोई भी जाति, पंथ और धर्म से ऊपर उठकर किसी भी खेल में भारत की जीत का जश्न मनाता है, वही सच्चा भारतीय और देशभक्त है। उन्होंने दृढ़ता से कहा कि भारत अपने चरित्र के कारण स्वभाव से एक हिंदू राष्ट्र रहा है और हमेशा रहेगा। प्रभु श्री राम को सर्वव्यापक बताते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम किस तरह भारत में एकता के सबसे बड़े सूत्रधार हैं।

इस अधिवेशन की एक बेहद अनूठी विशेषता यह थी कि हर प्रतिनिधि अपने-अपने घर से एक मुट्ठी चावल और एक मुट्ठी मिट्टी लेकर आया था। आखिरी दिन इन सभी चावलों को आपस में मिलाकर एक विशाल पात्र में ‘खीर’ बनाई गई, जो विविधता में एकता की मिठास को दर्शा रही थी। वहीं प्रतिनिधियों द्वारा लाई गई मिट्टी का उपयोग ‘भारत माता’ के भव्य मंदिर निर्माण में किया जाएगा। जब झारखंड का दल अध्यक्ष अनिरुद्ध सिंह के नेतृत्व में अपने राज्य का बैनर थामे, गाजे-बाजे के साथ मंच पर रखे विशाल कलश में चावल और मिट्टी समर्पित करने बढ़ा, तो वह दृश्य देखने लायक था।

झारखंड के प्रतिभागियों का पहनावा भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहा; महिलाएं पारंपरिक झारखंडी साड़ियों में थीं, जबकि सभी सदस्यों ने “जोहार” लिखे पारंपरिक गमोछे (स्कार्फ) धारण कर रखे थे, जिसके एक छोर पर भगवान बिरसा मुंडा और दूसरे छोर पर भारत भारती (भारत माता) का चित्र अंकित था।दूसरे दिन की शाम को भारत माता की भव्य आरती का आयोजन किया गया, जिसमें 400 से अधिक महिला-पुरुषों ने भाग लिया। परिसर में स्थित भारत माता मंदिर के सामने खुले आंगन में भारत के विशाल मानचित्र की आकृति में खड़े होकर जब सभी 400 प्रतिभागियों ने हाथों में जलते दीये लेकर महाआरती की, तो ड्रोन से लिया गया वह नजारा बेहद भावुक और विहंगम था।

पूरा परिसर “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम” के जयघोष से गुंजायमान रहा। इस वर्ष का यह अधिवेशन कई मायनों में ऐतिहासिक रहा क्योंकि यह राष्ट्रीय एकता के शिल्पकार सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती, भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती और बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित राष्ट्रीय गीत “वंदे मातरम” के 150 वर्ष पूरे होने के त्रिवेणी संगम को समर्पित था। चूंकि आयोजन महाराष्ट्र की धरती पर था, इसलिए छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरता को भी याद किया गया और पूरा पांडाल “जय भवानी” के नारों से गूंज उठा। तीन दिनों के इस वैचारिक और सांस्कृतिक महाकुंभ के समापन पर सभी प्रतिनिधियों ने अपने-अपने राज्यों में जाकर राष्ट्र प्रथम के इस संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया।

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.