झारखंड में राज्यसभा की खाली सीटों के लिए बिगुल बजते ही हर राजनीतिक दल के दफ्तर में ‘परम पावन’ मंथन शुरू हो चुका है और टिकटों के वितरण के लिए जो नई चयन प्रक्रिया अपनाई जा रही है, वह देश के किसी भी बड़े कॉर्पोरेट कैंपस प्लेसमेंट को आसानी से मात दे सकती है। इस बार योग्यता के पैमाने पूरी तरह बदल चुके हैं और पार्टी आलाकमान ने उम्मीदवारों की शॉर्टलिस्टिंग के लिए कुछ बेहद खास और आधुनिक नियम बनाए हैं, जिसमें सबसे पहला ‘मनी-पॉवर टेस्ट’ है जिसके तहत यह देखा जा रहा है कि उम्मीदवार की जेब कितनी भारी है और क्या वह चुनाव का भारी-भरकम ‘खर्च’ उठाने के साथ-साथ पार्टी के आर्थिक ‘भविष्य’ को भी सुरक्षित रख सकता है या नहीं। इसके साथ ही ‘वफादारी मीटर’ पर भी नेताओं को कसा जा रहा है, जहां पिछले पांच साल में जिसने एक बार भी दल नहीं बदला, उसे ‘कम अनुभवी’ मानकर सीधे रिजेक्ट किया जा रहा है और क्षेत्रीय समीकरणों को ताक पर रखकर यह तय किया जा रहा है कि उम्मीदवार राज्य की मिट्टी से जुड़ा हो या न हो, लेकिन दिल्ली के दरबार में उसकी हाजिरी चौबीसों घंटे पक्की होनी चाहिए।
पार्टी दफ्तरों के बाहर लगी कतारों में खड़े नेताओं के चेहरे देखने लायक हैं, जहां एक वरिष्ठ नेता कोने में बैठकर अपने समर्थकों से कह रहे थे कि उन्होंने तीस साल तक पार्टी की दरी बिछाई है इसलिए इस बार उनका टिकट पक्का है, लेकिन तभी अंदर से खबर आती है कि टिकट दिल्ली के एक नामी बिजनेसमैन को मिल गया है जिसने कभी झारखंड का नक्शा भी ठीक से नहीं देखा। वहीं एक अन्य दावेदार से जब पूछा गया कि झारखंड की मुख्य समस्याएं क्या हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि समस्याएं छोड़िए और यह बताइए कि वोट देने वाले विधायकों को रिसॉर्ट में कब भेजना है क्योंकि उनकी तरफ से सारी बुकिंग्स पहले से तैयार हैं। राजनीति के इस बदले रंग को देखकर दशकों से वफादारी का झंडा ढोने वाले कार्यकर्ता अब दफ्तर के बाहर बैठकर केवल चाय की चुस्कियां ले रहे हैं और अपनी ही किस्मत पर हंस रहे हैं।
चुनाव की तारीख नजदीक आते ही विधानसभा के माननीय सदस्यों के भाव भी सोने के भाव की तरह तेजी से चढ़ने लगे हैं और दल कोई भी हो, रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के लिए सभी ने अपने बैग पैक कर लिए हैं क्योंकि इस बार वोट देने का क्राइटेरिया ‘अंतरात्मा की आवाज’ नहीं, बल्कि ‘अकाउंट में आई आवाज’ होने की पूरी संभावना बन चुकी है। हर बार की तरह इस बार भी विधायकों के मोबाइल अचानक ‘आउट ऑफ रीच’ होने लगे हैं और उनके निजी सचिवों को केवल वीआईपी रिसॉर्ट्स के पते नोट करने का काम सौंप दिया गया है। लोकतंत्र के इस पावन उत्सव में वोट की कीमत इतनी बढ़ चुकी है कि आम जनता को अब अपने चुने हुए प्रतिनिधियों की इस ‘बाजारू’ प्रतिभा पर गर्व होने लगा है।
झारखंड की जनता हमेशा की तरह हैरान-परेशान खड़ी है क्योंकि उन्हें लगता था कि राज्यसभा में उनके राज्य की आवाज बुलंद करने के लिए कोई स्थानीय और कद्दावर नेता जाएगा, लेकिन राजनीति के इस खेल को देखकर वह भी अब अच्छी तरह समझ चुकी है कि दिल्ली का रास्ता रांची की गलियों से नहीं, बल्कि चाणक्य नीति और बड़े बजट के रास्तों से होकर ही गुजरता है। पार्टी आलाकमान ने भी अंत में साफ कर दिया है कि वे केवल उसी उम्मीदवार को चुनेंगे जो राज्य के विकास के लिए नहीं, बल्कि पार्टी की मजबूती के लिए ‘फंड’ और ‘बल’ दोनों एक साथ दे सके। इस प्रकार जनता अब पांच साल तक टीवी पर अपने नए माननीय सांसद को बिना पहचाने देखने के लिए पूरी तरह से मानसिक रूप से तैयार हो चुकी है।