NEWS7AIR

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: नियमितीकरण न होने पर भी पेंशन के हकदार होंगे लंबे समय तक काम करने वाले कैजुअल कर्मचारी

नई दिल्ली:सुप्रीम कोर्ट ने श्रम कल्याण और सामाजिक न्याय के हक में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया है कि यदि कोई कैजुअल (अस्थायी) कर्मचारी दशकों तक लगातार सेवा देता है और उसे ‘अस्थायी दर्जा’ (Temporary Status) मिल चुका है, तो केवल ‘औपचारिक नियमितीकरण’ (Formal Regularisation) का आदेश न होने के आधार पर उसे पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने ‘भीखनी देवी बनाम भारत संघ’ मामले में यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने पटना हाई कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसने तकनीकी आधार पर डाक विभाग के इन गरीब नाइट गार्ड्स (चौकीदारों) की पेंशन रोक दी थी।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला बिहार के मधुबनी जिले के राजनगर डाकघर में 1970 और 1980 के दशक में नियुक्त हुए तीन नाइट गार्ड्स (सूरज साह, बहुरूपी साहु और पीतांबर झा) से जुड़ा है। इन कर्मचारियों ने डाक विभाग में लगभग 30 से 40 साल तक बिना किसी रुकावट के लगातार काम किया।

विभाग की ‘कैजुअल लेबरर्स स्कीम 1991’ के तहत इन्हें 1992 में ‘अस्थायी दर्जा’ दिया गया और 3 साल की सेवा पूरी करने के बाद इन्हें ‘अस्थायी ग्रुप डी कर्मचारियों’ के समकक्ष माना गया। इसके तहत इन्हें नियमित वेतन, छुट्टियां, भविष्य निधि (GPF) और अन्य भत्ते भी मिलने लगे। लेकिन विभाग की लापरवाही के कारण सेवानिवृत्ति तक इनका औपचारिक रूप से नियमितीकरण नहीं किया जा सका । जब इन कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति और एक कर्मचारी की मौत के बाद उनकी विधवा (भीखनी देवी) ने फैमिली पेंशन की मांग की, तो डाक विभाग ने यह कहकर दावा खारिज कर दिया कि ये कर्मचारी ‘पक्के’ यानी रेगुलर नहीं हुए थे।

हाई कोर्ट की भूल को सुप्रीम कोर्ट ने सुधारा

सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) ने पहले कर्मचारियों के पक्ष में फैसला दिया था, लेकिन पटना हाई कोर्ट ने विभाग की अपील पर ट्रिब्यूनल के आदेश को यह कहते हुए पलट दिया कि बिना नियमितीकरण के पेंशन नहीं मिल सकती और मामला काफी देरी से कोर्ट में लाया गया है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई और दो मुख्य कानूनी सिद्धांत तय किए:

1. पेंशन एक निरंतर चलने वाला अधिकार है: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पेंशन का मामला ‘देरी’ (Delay and Laches) के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि पेंशन न मिलना हर महीने पैदा होने वाला एक नया विवाद (Recurring Cause of Action) है ।

2. पेंशन कोई खैरात नहीं, संपत्ति का अधिकार है: कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पेंशन कोई बख्शीश नहीं है, बल्कि कर्मचारी की लंबी सेवा की गाढ़ी कमाई है, जो संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत ‘संपत्ति के अधिकार’ के दायरे में आती है । नियोक्ता की प्रशासनिक सुस्ती या लापरवाही के कारण किसी गरीब कर्मचारी के इस संवैधानिक अधिकार को नहीं छीना जा सकता

‘मॉडल एम्प्लॉयर’ की तरह काम करे सरकार

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को याद दिलाया कि देश के संविधान के तहत राज्य (सरकार) को एक ‘आदर्श नियोक्ता’ (Model Employer) की भूमिका निभानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जब विभाग इन कर्मचारियों से नियमित कर्मचारियों की तरह ही रात-रात भर जागकर पूरी ड्यूटी ले रहा था, तो सिर्फ कागजी नामकरण (Nomenclature) के आधार पर उन्हें सामाजिक सुरक्षा और बुढ़ापे के सहारे से वंचित करना पूरी तरह से मनमाना और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब डाक विभाग को इन सभी याचिकाकर्ताओं और उनके परिवारों को सेवा अवधि की गणना करते हुए तुरंत पेंशन और बकाया राशि का भुगतान करना होगा . इस फैसले से देशभर के विभिन्न सरकारी विभागों में दशकों से ‘अस्थायी दर्जे’ पर काम कर रहे लाखों कैजुअल मजदूरों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.