हाल ही में जारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2023-24 के आंकड़े भारतीय रोजगार परिदृश्य के एक ऐसे पहलू को उजागर करते हैं, जो अब तक चर्चाओं से ओझल था। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि बेरोजगारी का स्वरूप अब केवल सामाजिक पिछड़ेपन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘योग्यता’ और
‘शहरीकरण’ के साथ जटिल रूप से जुड़ गया है।
आंकड़ों का तुलनात्मक विश्लेषण: कौन कहाँ खड़ा है?
सर्वेक्षण के अनुसार, भारत की राष्ट्रीय बेरोजगारी दर 3.2% है, लेकिन जब हम श्रेणियों (Castes) के आधार पर इसे देखते हैं, तो परिणाम चौंकाने वाले हैं:
1. सामान्य वर्ग (General Category): यहाँ बेरोजगारी दर सबसे अधिक 3.8% है, जो राष्ट्रीय औसत से 0.6% ज्यादा है।
2. अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 3.1% बेरोजगारी के साथ यह औसत के करीब है।
3. अनुसूचित जाति (SC): यहाँ दर 3.3% दर्ज की गई है।
4. अनुसूचित जनजाति (ST): सबसे कम 1.9% बेरोजगारी दर यहाँ देखी गई है।
शिक्षण का विरोधाभास: सबसे चिंताजनक आंकड़ा स्नातक (Graduates) स्तर का है, जहाँ बेरोजगारी दर 11.2% तक पहुँच गई है। वहीं, शहरी क्षेत्रों (5.1%) में ग्रामीण क्षेत्रों (2.5%) की तुलना में बेरोजगारी दोगुनी है।
इन आंकड़ों के आधार पर तुलना की जाए, तो ‘पिछड़ेपन’ की परिभाषा बदलती नजर आती है:
* आर्थिक और अवसर का पिछड़ापन: सामान्य वर्ग में बेरोजगारी का अधिक होना यह दर्शाता है कि परंपरागत रूप से समृद्ध माने जाने वाले इस वर्ग के पास अब निजी या सरकारी क्षेत्रों में रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं हैं। चूँकि इनके पास अक्सर आरक्षण का लाभ नहीं होता, इसलिए बाजार की मंदी का सीधा असर इन पर पड़ता है।
* कौशल का पिछड़ापन: स्नातक स्तर पर 11.2% बेरोजगारी यह बताती है कि हमारी डिग्री और बाजार की मांग के बीच एक बड़ी खाई है। शिक्षित युवा सबसे ज्यादा “बेरोजगार” हैं, जबकि कम शिक्षित या कुशल श्रमिक (जैसे ST श्रेणी में अक्सर देखा जाता है) किसी न किसी काम में लगे हुए हैं।
सरकारी मदद और सुधार की दिशा
आंकड़ों के इस आईने में सरकार को अपनी नीतियों में निम्नलिखित बदलाव करने की आवश्यकता है:
1. आर्थिक आधार पर समावेशन: सामान्य वर्ग में बढ़ती बेरोजगारी को देखते हुए EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) जैसे प्रावधानों को और अधिक सुदृढ़ और पारदर्शी बनाने की जरूरत है ताकि आर्थिक रूप से पिछड़े मेधावी युवाओं को सहारा मिल सके।
2. शहरी रोजगार गारंटी: जिस तरह ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ‘मनरेगा’ है, उसी तरह शहरी युवा रोजगार योजना की तत्काल आवश्यकता है, क्योंकि शहरों में बेरोजगारी दर (5.1%) चिंताजनक है।
3. स्किल इंडिया का पुनर्गठन: स्नातकों में 11% से अधिक बेरोजगारी एक ‘एजुकेशन इमरजेंसी’ है। डिग्री को कौशल (Skill) से जोड़ना अनिवार्य है ताकि युवा केवल सर्टिफिकेट धारक न बनकर “जॉब रेडी” बनें।
4. उद्यमिता को बढ़ावा: सभी को सरकारी नौकरी देना संभव नहीं है, इसलिए स्टार्टअप और स्वरोजगार के लिए बिना गारंटी लोन की योजनाओं का विस्तार हर वर्ग के लिए समान रूप से होना चाहिए।
निष्कर्ष:
PLFS 2023-24 के आंकड़े चेतावनी देते हैं कि यदि हमने शिक्षित युवाओं और सामान्य वर्ग में बढ़ती हताशा को नहीं संभाला, तो यह जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) एक बड़ी सामाजिक चुनौती बन सकता है। मदद की जरूरत अब केवल जाति देखकर नहीं, बल्कि ‘आर्थिक स्थिति’ और ‘अवसर की उपलब्धता’ को देखकर तय होनी चाहिए।