पूरा झारखंड की जनता अपराधियों से परेशान और पीड़ित है। राजधानी की सभी छोटी-बड़ी दुकानें रात 8 बजे ही इस डर से बंद हो जाती हैं कि कोई उन्हें लूट न ले, और वास्तविकता में लोग लूटे भी जा रहे हैं। आए दिन राजधानी और अन्य जिला में हत्या, अपहरण, जबरन वसूली, पेट्रोल पंप डकैती और मॉल में डकैती करके अपराधी आराम से निकल जाते हैं। मान लेते हैं कि हत्या एक रैंडम घटना है जिस पर नियंत्रण कठिन हो सकता है, लेकिन जो संगठित अपराध हैं—जैसे डकैती, ट्रैफिकिंग, लूट, ब्राउन शुगर या ड्रग्स माफिया गिरी, वेश्यावृत्ति, जबरन वसूली और जेल से संचालित संगठित अपराध—इन्हें तो पुलिस चाहे तो बिल्कुल रोक सकती है। सच तो यह है कि अधिकतर अपराध पुलिस के संरक्षण में ही चल रहे हैं।
यहाँ का अपराधी फर्जी पासपोर्ट बनाकर अजरबैजान, फ्रांस और इंग्लैंड चला जा रहा है और पुलिस पूरी तरह विफल हो गई है। ड्रग्स का धंधा धड़ल्ले से चल रहा है, यहाँ तक कि जेल से भी अपराध संगठित हो रहा है। क्राइम डेटा से पता चलता है कि सबसे ज्यादा हत्याएं पहले गुमला में होती थीं, जो अब रांची में ज्यादा होने लगी हैं। साइबर अपराध जैसे विषयों के लिए हमें जामताड़ा से विश्वव्यापी कुख्याति मिली है। धनबाद को तो छोड़ ही दीजिए, इस पर तो दो-तीन फिल्में ही बन गई हैं। यह हमारे पिछले 25 सालों के ‘बबुआ झारखंड’ की छवि है और हमारे पुलिस मंत्री तथा पुलिस की काबिलियत का भी प्रमाण है।
डीजीपी भी भाड़े पर चल रहे हैं, जिन्हें रिटायरमेंट के बाद भी बहाल किया गया है। डीजीपी तड़शा मिश्रा जी की कार्यशैली देखकर मुझे लगता है कि जनता के लिए उनका सही नाम ‘हताशा मिश्रा’ होना चाहिए था। यही पुलिस ‘सुपर कॉप’ बनकर एक निहत्थे बुजुर्ग रैयत का घर तोड़ने के लिए सायरन बजाते हुए 100 से ज्यादा गाड़ियों के साथ हाजिर होती है, वह भी एनटीपीसी का पल्लू पकड़कर। ऐसी ’12 बजी हुई’ पुलिस का डायल नंबर 112 न होकर सिर्फ 12 होना चाहिए था। यह सब देखकर मुझे लगता है कि पुलिस मंत्रालय को भी एनटीपीसी को ही दे देना चाहिए। सरकार के पास पुलिस मंत्रालय रहे या न रहे, चाहे वह एनटीपीसी के पास ही क्यों न रहे, जनता का हाल एक ही रहेगा।
संविधान में हमने पढ़ा था कि सरकार एक स्वतंत्र सत्ता होती है, परंतु वर्तमान वास्तविकता यह है कि यह ‘स्पॉन्सर्ड स्वतंत्रता’ की तरफ बढ़ रही है। जो सरकार को स्पॉन्सर करे, सरकार उसी की हो जाती है। क्या हम ‘जल, जंगल, जमीन’ का नारा लगाकर ‘जंगल राज’ की प्रतिष्ठा करना चाह रहे हैं? हम सुन रहे हैं कि झारखंड उग्रवाद से मुक्त हुआ, पर देख रहे हैं कि यह उपद्रवियों से भर गया है। जगह-जगह पोस्टर दिखते हैं—”उग्रवाद मुक्त झारखंड में आपका स्वागत है”; वहाँ लिख देना चाहिए—”उपद्रव युक्त झारखंड में आपका स्वागत है”। पुलिस एक गिरोह को ऊपर उठाने के लिए दूसरे गिरोह को सुपारी लेकर मार रही है। इसके लिए उन्हें पैसा भी मिला और मेडल भी मिला; रक्षक ही भक्षक बन गया है।
फर्ज करिए कि कोई भूत आपकी तरफ आ रहा है और वह भी हनुमान चालीसा पढ़ते हुए, तो आप उस बला से बचने के लिए क्या पढ़ेंगे? यहाँ तो सभी भूत ही हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं, ऐसे में लोग क्या करें? पहले 100 नंबर पर 100 बार फोन करने पर भी फोन नहीं उठता था, अब आपको 112 पर 112 बार फोन करना पड़ेगा तब भी नहीं उठाएगा। परिणाम वही है—पहले भी नतीजा शून्य था और अभी भी शून्य ही रहेगा। मुझे लगता है कि आगे का ‘एक’ मिटा देना चाहिए और डायल नंबर केवल 12 होना चाहिए क्योंकि पुलिस की तो खुद 12 बज चुकी है। अगर किसी को अपना 12 बजवाना हो, तो इन्हें डायल कर लीजिए।
बिजली गुल और मीटर चालू वाली व्यवस्था नहीं चलेगी। झारखंड पुलिस का रिमोट कंट्रोल झारखंड सरकार के पास है पर बैटरी अमित शाह लेकर चले गए हैं, अब ऐसे में सरकार क्या करे! झारखंड पुलिस की नई सवारी के बदन पर लिखा है—’आपकी सुरक्षा, हमारी जिम्मेदारी’। मेरा एक सवाल है कि यह ‘आप’ है कौन? वह नागरिक तो बिल्कुल नहीं है। यदि नागरिक होता, तो लिखा जाता: ‘नागरिक सुरक्षा, हमारी जिम्मेदारी’।
(अंबा प्रसाद (Amba Prasad) वर्तमान में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की राष्ट्रीय सचिव और पश्चिम बंगाल की सह-प्रभारी के रूप में कार्यरत हैं। यह उनका व्यक्तिगत विचार है।)