भारत में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस एक ऐसा दिन है, जब दुनिया को बेहतर बनाने के लिए की गई महान वैज्ञानिक उपलब्धियों और योगदानों का सम्मान किया जाता है। इस दिन पूरे भारत में विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों और संगठनों में वाद-विवाद, विज्ञान मेले, सेमिनार और प्रदर्शनियाँ आयोजित की जाती हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग हर साल उत्सव का आयोजन करता है। यह शैक्षणिक संस्थानों और वैज्ञानिक समाजों के सहयोग से किया जाता है। इससे बेहतर कल बनाने में विज्ञान की महान भूमिका पर जोर देने में मदद मिलती है। वैज्ञानिक प्रगति पर ध्यान केंद्रित करते हुए स्कूलों, कॉलेजों और अनुसंधान केंद्रों द्वारा कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। वे शोध की नई दिशाओं पर भी चर्चा करते हैं, जिससे छात्रों को विज्ञान में करियर बनाने के लिए प्रेरणा मिलती है।
विज्ञान कोई जड़ वस्तु नहीं है, बल्कि यह वह ज्योति है जो अज्ञानता के अंधकार को मिटाती है। मानव सभ्यता का इतिहास वास्तव में उसकी वैज्ञानिक जिज्ञासा का इतिहास है। जिस क्षण आदिमानव ने दो पत्थरों को रगड़कर आग पैदा की, वहीं से विज्ञान की यात्रा प्रारंभ हुई थी। भारत के लिए विज्ञान केवल आधुनिकता का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह हमारी सनातन परंपरा का हिस्सा है। इसी वैज्ञानिक चेतना को उत्सव का रूप देने के लिए भारत प्रतिवर्ष 28 फरवरी को ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ (National Science Day) मनाता है। यह दिन केवल एक महान वैज्ञानिक की खोज का स्मरण मात्र नहीं है, बल्कि यह भारत के प्रत्येक नागरिक के भीतर छिपे ‘तार्किक मानस’ को जगाने का आह्वान है।
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की उत्पत्ति का सीधा संबंध 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली भौतिकविदों में से एक, सर चंद्रशेखर वेंकट रमन से है। 1921 की बात है, जब सर सी.वी. रमन एक जहाज से लंदन से कलकत्ता लौट रहे थे। उस समय भूमध्य सागर के पानी के गहरे नीले रंग ने उन्हें विचारमग्न कर दिया। उस काल के महान वैज्ञानिक लॉर्ड रेले का मानना था कि समुद्र का नीला रंग आकाश के परावर्तन के कारण होता है। रमन ने इस तर्क को चुनौती दी। उन्होंने जहाज पर ही एक साधारण ‘निकोल्स प्रिज्म’ की सहायता से समुद्र के पानी का परीक्षण किया और पाया कि पानी स्वयं प्रकाश को प्रकीर्णित (Scatter) कर रहा है। अगले सात वर्षों तक, रमन ने कलकत्ता की ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साइंस’ (IACS) में अपनी शोध जारी रखी। अंततः 28 फरवरी 1928 को उन्होंने दुनिया को बताया कि जब एकवर्णी प्रकाश (Monochromatic Light) किसी पारदर्शी माध्यम से गुजरता है, तो उसकी आवृत्ति और ऊर्जा में परिवर्तन होता है। इस परिवर्तन को ही ‘रमन प्रभाव’ कहा गया। इस खोज ने पूरी दुनिया को हिला दिया।
रमन प्रभाव ने यह सिद्ध किया कि प्रकाश की प्रकृति में बदलाव अणु की संरचना के कारण होता है। इस अभूतपूर्व कार्य के लिए उन्हें 1930 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया। वे विज्ञान में नोबेल पाने वाले पहले भारतीय और पहले एशियाई व्यक्ति थे। 1986 में, भारत सरकार ने उनकी इसी महान खोज की वर्षगांठ को ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ के रूप में घोषित किया। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर यह अनिवार्य है कि हम अपनी प्राचीन वैज्ञानिक विरासत का स्मरण करें। भारत ने तब विज्ञान दिया था जब दुनिया कबीलाई संघर्षों में उलझी थी। महान आर्यभट्ट ने न केवल ‘शून्य’ दिया, बल्कि बीजगणित और त्रिकोणमिति की नींव भी रखी। उन्होंने ईसा पूर्व ही बता दिया था कि पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है।
भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण के नियम न्यूटन से सदियों पहले प्रतिपादित किए थे। उनके ग्रंथ ‘सिद्धान्त शिरोमणि’ में ग्रहों की गति का सटीक वर्णन है। महर्षि सुश्रुत को ‘शल्य चिकित्सा का जनक’ कहा जाता है। उनके द्वारा रचित ‘सुश्रुत संहिता’ में 120 से अधिक सर्जिकल उपकरणों और जटिल प्लास्टिक सर्जरी का वर्णन है। दिल्ली के कुतुब मीनार परिसर में खड़ा ‘लौह स्तंभ’ (Iron Pillar) 1600 वर्षों से खुले आसमान के नीचे है, लेकिन आज तक उसमें जंग नहीं लगा। यह भारत के प्राचीन रसायनों और धातु विज्ञान की पराकाष्ठा है। आज 2026 में, भारत विज्ञान के क्षेत्र में एक ‘ग्लोबल हब’ बन चुका है। अब हम केवल तकनीकी उपभोक्ता नहीं, बल्कि तकनीकी निर्माता हैं।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अंतरिक्ष विज्ञान की परिभाषा बदल दी है। चंद्रयान और मंगलयान: चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक उतरने वाला पहला देश बनकर भारत ने इतिहास रचा। 2026 में, हम चंद्रमा से नमूने वापस लाने के मिशन और मंगल पर ‘लैंडर’ भेजने की तैयारी में हैं। गगनयान मिशन: 2026 भारत के लिए ऐतिहासिक वर्ष है क्योंकि हम अपने ‘व्योममित्र’ और मानव मिशन को अंतरिक्ष में भेजने के अंतिम चरण में हैं। आदित्य L1: सूर्य के निरंतर अध्ययन ने भारत को सौर भौतिकी के शीर्ष देशों में खड़ा कर दिया है।
भारत ने अपनी ‘AI for All’ नीति के माध्यम से यह सुनिश्चित किया है कि तकनीक केवल शहरों तक सीमित न रहे। 2026 तक, भारत की कृषि प्रणालियाँ, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा क्षेत्र AI और मशीन लर्निंग के माध्यम से संचालित हो रहे हैं, जिससे ग्रामीण भारत का जीवन स्तर सुधरा है। जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती का समाधान भारत के पास है। ‘नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन’ के तहत भारत 2026 तक दुनिया के सबसे बड़े हरित हाइड्रोजन उत्पादकों में से एक बन रहा है। हमारी सौर ऊर्जा क्षमता ने हमें दुनिया के शीर्ष 5 देशों में ला खड़ा किया है।
“विज्ञान वह साधन है, जिससे हम ईश्वर की रचना को
समझ सकते हैं और मानवता की पीड़ा को हर सकते हैं।”
विज्ञान दिवस का उत्सव केवल सरकारी आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। भारत के संविधान के अनुसार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य है। इसका अर्थ है—बिना प्रमाण के किसी बात को न मानना और हर विषय पर तर्क करना। विज्ञान अज्ञानता की बेड़ियों को काटता है। समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधविश्वासों को केवल वैज्ञानिक साक्षरता से ही मिटाया जा सकता है। युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहन: ‘इंस्पायर’ (INSPIRE) जैसी योजनाओं के माध्यम से सरकार लाखों स्कूली बच्चों को नवाचार के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
विज्ञान दिवस इन बच्चों को अपने मॉडल और विचार प्रदर्शित करने का मंच देता है। लोक कल्याण के लिए विज्ञान: विज्ञान का अंतिम लक्ष्य मानवता की सेवा है। चाहे वह सस्ता इलाज हो, शुद्ध जल हो या प्रदूषण मुक्त हवा—विज्ञान को जन-सामान्य की समस्याओं का समाधान करना चाहिए। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) के क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी 2026 में बढ़ी तो है, लेकिन अभी भी नेतृत्व के पदों पर उनकी संख्या बढ़ानी शेष है।
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस हमें यह याद दिलाता है कि हमारे पास डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसी दृष्टि, डॉ. होमी जहांगीर भाभा जैसा साहस और सर सी.वी. रमन जैसी जिज्ञासा होनी चाहिए। 2026 का यह समय भारत के लिए ‘अमृत काल’ का समय है। यदि हम अपने बच्चों में प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति को जीवित रखते हैं, तो आने वाले समय में भारत न केवल ‘जगत गुरु’ बनेगा, बल्कि ‘विज्ञान गुरु’ भी बनेगा। संकल्प: आइए, इस विज्ञान दिवस पर हम प्रतिज्ञा करें कि हम अपने दैनिक जीवन में विज्ञान को अपनाएंगे, पर्यावरण को तकनीक से बचाएंगे और एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जहाँ ज्ञान का प्रकाश हर घर तक पहुँचे।
अखिलेन्द्र प्रताप सिंह (सन्नी)
कोषाध्यक्ष
भारतीय जनता युवा मोर्चा
काशी प्रांत, उ ० प्र ०

