NEWS7AIR

पश्चिम बंगाल और हैदराबाद में ‘प्रतिकृति’ के नाम पर नई राजनीति

क्या चुनावी लाभ के लिए कुरेदे जा रहे हैं पुराने जख्म?

हाल ही में कुछ क्षेत्रीय राजनीतिक नेताओं द्वारा “बाबरी मस्जिद” के पुनर्निर्माण के प्रयास उस विवाद को फिर से हवा देने की कोशिश प्रतीत होते हैं, जिसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही सुलझा दिया है। 6 दिसंबर, 2025 को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के एक नेता हुमायूँ कबीर ने बेलडांगा में तथाकथित “नई बाबरी मस्जिद” की आधारशिला रखी। उन्होंने इसे 1992 में ढहाई गई मस्जिद की हूबहू नकल बताया है। यह कार्यक्रम ठीक उसी तारीख को आयोजित किया गया जब बाबरी ढांचा गिराया गया था। विशेष बात यह है कि एक दिन पहले ही कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इस निर्माण पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

हालांकि, यह कदम धार्मिक आस्था से अधिक राजनीतिक अस्तित्व बचाने की छटपटाहट जैसा लगता है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) से निलंबन के बाद कबीर ने अपनी नई पार्टी ‘जनता उन्नयन पार्टी’ बनाई है। कबीर का राजनीतिक करियर दल-बदल से भरा रहा है—कांग्रेस से TMC, फिर BJP और फिर वापस TMC। जानकारों का मानना है कि विकास के ठोस मुद्दों के अभाव में, मुस्लिम बहुल जिले में वोट बैंक को एकजुट करने के लिए भावनाओं का सहारा लिया जा रहा है।

इसी तरह, हैदराबाद में मोहम्मद मुश्ताक मलिक ने भी बाबरी मस्जिद की तर्ज पर एक “स्मारक मस्जिद” बनाने की योजना की घोषणा की है। ऐसे प्रयास सांप्रदायिक भावनाओं को फिर से भड़का सकते हैं, जबकि 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि राम मंदिर के लिए सौंप दी थी और मस्जिद के लिए अयोध्या में ही पांच एकड़ वैकल्पिक भूमि आवंटित करने का निर्देश दिया था।

2024 में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ यह विवाद प्रतीकात्मक रूप से समाप्त हो गया था, लेकिन आवंटित भूमि पर मस्जिद का निर्माण अभी तक शुरू नहीं हो पाया है। प्रशासनिक देरी और संसाधनों की कमी को इसका कारण बताया जा रहा है। कानूनी रूप से आवंटित भूमि के बजाय कहीं और ‘रेप्लिका’ (प्रतिकृति) बनाना सामाजिक सौहार्द के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। आज जरूरत शिक्षा, रोजगार और गरीबी जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की है, न कि पुराने विवादों को राजनीतिक मंच बनाने की।

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.