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एक उपन्यास जो धार्मिक कट्टरता की आलोचना करता है

मोहसिन खान वर उर्दू उपन्यास ‘अल्लाह मियाँ का कारख़ाना’ कठोर धार्मिक कट्टरत , सामाजिक अन्याय और पारिवारिक उपेक्षा के बीच कुचले जाते एक मासूम बच्चे की मार्मिक कथा प्रस्तुत करता है। उपन्यास का केंद्र जिब्राल है, जो एक अत्यंत रुढ़िवादी और सद्युत धार्मिक माहौल में पलता है। उसका विला तब्लीगी जमात से जुड़ा, तानाशाही प्रवृत्ति वा व्यक्ति है, जो दुनियावी शिक्षा वर्षे नक्परते हुए जिब्रान पर हाफिज और आलिम बनने का दबाव डालता है, जबकि स्वयं परिवार से भावनात्मक रूप से अनुपस्थित रहता है।

जिब्रान का बचपन भय, हिंसा और दंड से भरा हुआ है। उसे घर और मदरसे दोनों जगह शारीरिक यातनाएं झेलनी पड़ती हैं, और मस्जिद में यौन शोषण जैसी भयावह घटना भी उसकी जिंदगी का हिस्सा बनती है। ये अत्याचार ‘धार्मिक अनुशासन” के नाम पर सामान्य बना दिए जाते हैं। उसका कुरआन शिक्षक कठोरता और डर का प्रतीक है।

इसके विपरीत, जिब्रान की इच्चाएँ बहुत साधारण हैं-पतंग उड़ाना, मेले में जाना और एक सामान्य बत्तयन जीना। उपन्यास जिब्रान के आंतरिक संघर्ष को बहराई से चित्रित करता है. जहाँ वाह है ‘घर, न्याय, प्रेम, भय और मृत्यु के अर्थ पर सवाल उठाता है। कहानी तब और दर्दनाक हो जाती है जब उसके पिता की गिरफ्तारी होती है, माँ प्रसव के दौरान मर जाती है और रिश्तेदार उसे ठुकरा देते हैं। अंतत जिब्रान को एक मदरसा शिक्षक के घर शरण मिलती है, जहाँ उसे थोड़ी स्थिरता तो मिलती है. पर अकेलापन और संघर्ष बने रहते .

यह उपन्यास दद्यात्मक धार्मिक सोच और सामाजिक सत्ता संरचनाओं की तीखी आलोचना करता है. जो मासूम बच्चों पर अत्याचार को वैध ठहराती हैं। सरल भाषा में कही गई यह वध्या गहरे भावनात्मक प्रभाव के साथ पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहरता. झूठी धार्मिकना और अन्याय की कीमत अवसर सबसे जयादा निदोष बच्चों को तुवचनी पड़ती है।

उपन्यास जिब्रान के आंतरिक संघर्ष को गहराई से चित्रित करता है, जहाँ वह ईश्वर, न्याय, प्रेम, भय और मृत्यु के अर्थ पर सवाल उठाता है। कहानी तब और दर्दनाक हो जाती है जब उसके पिता की गिरफ्‌तारी होती है, माँ प्रसव के दौरान मर जाती है और रिश्तेदार उसे ठुकरा देते हैं। अंततः जिब्रान को एक मदरसा शिक्षक के घर शरण मिलती है. जहाँ उसे थोडी स्थिरता तो मिलती है, पर अकेलापन और संघर्ष बने रहते हैं।
यह उपन्यास दंडात्मक धार्मिक सोच और सामाजिक सत्ता संरचनाओं की तीखी आलोचना करता है, जो मासूम बच्चों पर अत्याचार को वैध ठहराती हैं। सरल भाषा में कही गई यह कथा गहरे भावनात्मक प्रभाव के साथ पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि कट्टरता, झूठी धार्मिकता और अन्याय की कीमत अक्सर सबसे ज़्यादा निर्दोष बच्चों को चुकानी पड़ती है।

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