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जिहाद और जिहाद की सही समझ जलता हुआ रेगिस्तान या नग्न सत्य की…(भाग-1 )

हालांकि जिहाद लंबे समय से मीडिया में एक स्थायी विषय रहा है और हर किसी के लिए चर्चा का केंद्र बना हुआ है, लेकिन बीते एक सप्ताह में यह विषय सामान्य से कहीं अधिक तीव्रता के साथ बहस में आ गया। ऐसा शोर-शराबा मचा कि मानो हर किसी को इस पर कुछ न कुछ कहना ही था। आप जिसे भी सुनते, वह अपने-अपने तरीके से जिहाद पर चर्चा करता दिखाई देता।

इसी शोर और अफरा-तफरी के बीच मुझे अपने प्रिय मित्र, प्रतिष्ठित शोधकर्ता और लेखक डॉ. जीशान अहमद मिस्बाही की पुस्तक अंडरस्टैंडिंग जिहाद (Understanding Jihad) याद आईं, जो मेरी गेज़ पर रखी हुई थी और जिसे में भूल चुका था। जब अंततः मैंने इसके पन्ने पलटे, तो मैं एक ही बैठक में इसकी पूरी 198 पृष्ठों की पुस्तक पढ़ गया। यह पुस्तक उन सभी पक्षों के लिए एक प्रकार की मरहम है, जो इस खेल में शामिल है- विशेष रूप से उनके लिए जो इस्लामी जिहाद की अवधारणा को अपने स्वाथी उद्देश्यों के लिए तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं।गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि जिहाद इस्लाम और कुरान के सबसे अधिक उत्पीडित शट्टों में से एक है। 

यह एक दोधारी तलवार बन चुका है, जिसे एक ओर  इस्लाम के बाहरी दुश्मन और दूसरी ओर आंतरिक शत्रु-जो अपने रक्तरंजित हितों के लिए इसका दुरुपयोग करते हैं- दोनों निशाना बनाते हैं। इतिहास के पन्ने पलटने पर बार-बार यह दिखाई देता है कि ये दोनों तत्व अवसर आपस में जुड़े रहे हैं। दोनों का उद्देश्य एक ही होता है और वे “मेरे दुश्मन का दुर्जन मेरा दोस्त के सिद्धांत पर काम करते हैं। इसी तरह कई मुस्लिम समूह भी एक-दूसरे का खून बहाने को जायज ठहराने के लिए जिहाद की अवधारणा का सहारा लेते हैं। सूडान में लाखों लोग मारे जा चुके हैं: क्रूरता इस हद तक पहुँच चुकी है कि महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। हैरानी की बात यह है कि इस भयानक रक्तपात में शामिल दोनों पक्ष अपने-अपने कृत्य को जिहाद बता रहे हैं।

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