रांची: पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य में धान खरीद की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए हेमंत सोरेन सरकार पर भ्रष्टाचार और बिचौलियों को संरक्षण देने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि सरकार का ‘गांव से शासन’ का दावा खोखला है और झारखंड का अन्नदाता आज बिचौलियों के हाथों औने-पौने दाम पर फसल बेचने को मजबूर है।
लक्ष्य और हकीकत का अंतर
मरांडी ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि राज्य सरकार ने इस वर्ष 60 लाख क्विंटल धान खरीद का लक्ष्य रखा था, लेकिन दो महीने बाद भी केवल 19.80 लाख क्विंटल की ही खरीद हो पाई है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि राज्य में 2.79 लाख पंजीकृत किसान हैं, मगर सरकार ने अब तक केवल 35,547 किसानों से ही धान खरीदा है। उनके अनुसार, गोदाम भरे होने का बहाना बनाकर सीमांत किसानों को परेशान किया जा रहा है, जिन्हें अपनी तात्कालिक जरूरतों के लिए तत्काल नकद की आवश्यकता होती है।
एमएसपी और बोनस पर तीखा प्रहार
नेता प्रतिपक्ष ने चुनावी वादों की याद दिलाते हुए कहा कि झामुमो ने ₹3200 प्रति क्विंटल MSP का वादा किया था, लेकिन इसे घटाकर ₹2400 कर दिया गया। इसमें भी ₹2300 का योगदान केंद्र सरकार का है, जबकि राज्य सरकार केवल ₹100 की भागीदारी निभा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर देरी कर रही है ताकि किसान मजबूर होकर ₹1500 में बिचौलियों को धान बेच दें, और बाद में यही बिचौलिया सरकार को धान बेचकर सरकारी खजाने और मुख्यमंत्री की तिजोरी भरें।
सिंडिकेट और फर्जीवाड़े का आरोप
बाबूलाल मरांडी ने गुमला जिले का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां फर्जी किसानों के नाम पर धान खरीद का बड़ा घोटाला उजागर हुआ है। उन्होंने इस संबंध में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखने और सदन में मुद्दा उठाने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई न होने पर रोष व्यक्त किया। उन्होंने दावा किया कि राज्य में एक संगठित ‘सिंडिकेट’ सक्रिय है जिसे सरकार का मूक समर्थन प्राप्त है।