नई दिल्ली/रांची: झारखंड आंदोलन के प्रणेता और आदिवासियों के सर्वमान्य नेता ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन को केंद्र सरकार ने मरणोपरांत देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से नवाजने का निर्णय लिया है। सार्वजनिक मामलों (Public Affairs) के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए यह सम्मान प्रदान किया जा रहा है। 4 अगस्त, 2025 को 81 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था, जिसके बाद यह उनका पहला बड़ा राष्ट्रीय सम्मान है।
एक संघर्षशील जीवन का सफर
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ के नेमरा गांव में हुआ था। जब वे मात्र 13 वर्ष के थे, तब महाजनी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उनके पिता सोबरन मांझी की हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और उन्होंने आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए ‘धनकटनी आंदोलन’ की शुरुआत की। उनकी लोकप्रियता और ज्ञान के कारण संथाली समाज ने उन्हें ‘दिशोम गुरु’ (देश का गुरु) की उपाधि दी।
झारखंड राज्य के निर्माण में भूमिका
शिबू सोरेन ने 1973 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की और पृथक झारखंड राज्य की मांग को लेकर दशकों तक संघर्ष किया। उनके नेतृत्व में चले लंबे आंदोलन के परिणामस्वरूप ही साल 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य अस्तित्व में आया। वे झारखंड के तीन बार मुख्यमंत्री रहे और केंद्र सरकार में कोयला मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली।
पुरस्कार का महत्व और प्रतिक्रिया
2026 के पद्म पुरस्कारों में शिबू सोरेन का नाम शामिल होना उनके लंबे राजनीतिक जीवन और आदिवासी समाज के प्रति समर्पण की स्वीकृति है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने इस फैसले का स्वागत किया है, हालांकि पार्टी ने उनके लिए ‘भारत रत्न’ की मांग भी दोहराई है।
शिबू सोरेन के अलावा इस वर्ष अभिनेता धर्मेंद्र को मरणोपरांत पद्म विभूषण और क्रिकेटर रोहित शर्मा को पद्म श्री से सम्मानित किया गया है।