मोहसिन खान का उर्दू उपन्यास “अल्लाह मियाँ का कारखाना” कठोर धार्मिक कट्टरता, सामाजिक अन्याय और पारिवारिक उपेक्षा के बीच कुचले जाते एक मासूम बच्चे की मार्मिक कथा प्रस्तुत करता है। उपन्यास का केंद्र जिब्रान है, जो एक अत्यंत रूढ़िवादी और सख्त धार्मिक माहौल में पलता है। उसका पिता तब्लीगी जमात से जुड़ा, तानाशाही प्रवृत्ति का व्यक्ति है, जो दुनियावी शिक्षा को नकारते हुए जिब्रान पर हाफ़िज़ और आलिग बनने का दबाव डालता है, जबकि स्वयं परिवार से भावनात्मक रूप से अनुपस्थित रहता है।
जिब्रान का बचपन भय, हिंसा और दंड से भरा हुआ है। उसे घर और मदरसे दोनों जगह शारीरिक यातनाएँ झेलनी पड़ती हैं, और मस्जिद में यौन शोषण जैसी भयावह घटना भी उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बनती है। ये अत्याचार “धार्मिक अनुशासन” के नाम पर सामान्य बना दिए जाते हैं। उसका कुरआन शिक्षक कठोरता और डर का प्रतीक है। इसके विपरीत, जिब्रान की इच्छाएँ बहुत साधारण हैं- पतंग उड़ाना, मेले में जाना और एक सामान्य बचपन जीना ।