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किताब में घपले-घोटाले के साथ ब्यूरोक्रेसी, राजनीति, सत्ता की अंदरूनी कहानी व रोचक किस्से

राष्ट्रीय पुस्तक मेले में चर्चित पुस्तक ‘नीले आकाश का सच’ पर परिचर्चा

Ranchi: राष्ट्रीय पुस्तक मेले में शुक्रवार को वरिष्ठ पत्रकार अमरेंद्र कुमार की पुस्तक ‘नीले आकाश का सच’ के संदर्भ में झारखंड-बिहार की राजनीति को लेकर परिचर्चा का अायोजन हुअा। पूर्व सूचना आयुक्त सह वरिष्ठ पत्रकार बैजनाथ मित्र, पत्रकार राजेंद्र तिवारी, विधानसभा के पूर्व उप सचिव अयोध्यानाथ मिश्र, महर्षि मेंही आश्रम के निर्मलानंदजी महाराज आदि मौजूद थे। बैजनाथ मिश्र ने पुस्तक पर परिचर्चा करते हुए कहा कि इसे उपन्यास कहा जा रहा है, पर यह राजनीति स्टंट का संग्रहण है। पत्रकार और साहित्यकार में अंतर होता है। साहित्यकार पहले उलझाता है, फिर सुलझाता है। वहीं पत्रकार पहले ही पैराग्राफ में ही सब कुछ सुलझा देता है। पत्रकारिता को हड़बड़ी का साहित्य भी कहते हैं। एसएस फंड को लेकर मामला हाईकोर्ट तक गया। इसकी कहीं जांच नहीं होती। उन्होंने इसे सूचना के रूप में पुस्तक में रखा है। चारा घेाटाला की पूरी नोटिंग है। लालू यादव अपनी पत्नी की जगह कांती जी को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। गुजरात साहब के कहने पर पत्नी को सीएम बनाया। वहीं, मैन हार्ट व ओआरएस का झगड़ा, एसीबी जांच, लोक सेवा आयोग की खोलती नियुक्ति की पोल आदि इस पुस्तक में शामिल है। संचालन पत्रकार कुंदन कुमार व धन्यवाद ज्ञापन प्रो. जंगबहादुर पांडेय ने किया।

लालू यादव की छिपी कहानी भी पुस्तक में है : राजेंद्र तिवारी

वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र तिवारी ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की कहानी इस पुस्तक में है। लालू 1990 में जीत कर आए और मुख्यमंत्री बने। 2005 आते-आते खलनायक कैसे हो गए। क्या सच्ची बात लिखी गई, अमरेंद्र जी के पास जो जानकारियां सामने आईं उसे उन्होंने पुस्तक का रूप दिया। उसमें लालू यादव की कहानी छिपी है। एसएस फंड, जेपीएससी जैसी कई कहानियां हैं। जो समाज व सरकार के बारे चिंतित रहता है, उन सभी को इस पुस्तक को जरूर पढ़ना चाहिए। पत्रकार कई चीजों को छुपा लेते हैं, वो सही नहीं है, मैं लालू यादव का प्रशंसक नहीं हूं, पर सच्ची बात कह रहा हूं। जगन्नाथ मिश्र व लालू यादव का क्या मामला है। नए पत्रकारों को इनसे सीख लेनी चाहिए। झारखंड संघर्ष के बाद बना, इतनी संभावनाओं के बावजूद देश के सबसे गरीब राज्यों में शुमार है। लीडर्स व पत्रकार दोनों ही जिम्मेदार हैं। हम अपनी रांची को संभाल नहीं पाए। 2009 का झारखंड अलग था, अब नदी भी नाले में बदल गई।

पुस्तक लेखन में पत्रकार ने धर्म निभाया है : अयोध्यानाथ मिश्र

अयोध्यानाथ मिश्र ने कहा कि पत्रकार जब साहित्यकार हो जाता है, तब वह बहुत तीक्ष्ण हो जाता है। पहली पंक्ति में ही सब कुछ बता जाता है। इसमें कई विषय हैं। प्राथमिकताएं, पशुपालन, घोटाला, सचिवालय का सच, जो सच बोलता है। मैंने जीवन भर सचिवालय में काम किया। खान का उद्योग, शराब का खेल, पानी से भ्रष्टाचार का रिश्ता यह सब प्रथम चरण का है। यह अनूठी पुस्तक है। इस पुस्तक में पत्रकार ने अपना धर्म निभाया है। लेखक अमरेंद्र कुमार ने कहा कि इस किताब में घपले-घोटाले के साथ ब्यूरोक्रेसी, राजनीति, सत्ता की अंदरूनी कहानी व रोचक किस्से हैं। मेरे पत्रकारिता जीवन के अनुभव का निचोड़ है।”

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