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एनयूएसआरएल रांची ने प्रोजेक्ट JAI के अंतर्गत सतत विधिक शिक्षा कार्यक्रम के बैच-I का सफलतापूर्वक किया समापन

रांची: नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (NUSRL), रांची ने अपने प्रोजेक्ट JAI (Justice Access Initiative) के अंतर्गत संचालित सतत विधिक शिक्षा (Continuous Legal Education – CLE) कार्यक्रम के बैच-I का सफलतापूर्वक समापन किया। यह कार्यक्रम मार्च से मई 2026 तक आयोजित किया गया।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य झारखंड के विभिन्न जिलों के युवा अधिवक्ताओं को प्रभावी विधिक अभ्यास के लिए आवश्यक विधिक ज्ञान, व्यावहारिक कौशल एवं पेशेवर दक्षताओं से सशक्त बनाना था। संवादात्मक सत्रों, चर्चाओं एवं व्यावहारिक अभ्यासों के माध्यम से प्रतिभागियों को विधिक प्रक्रियाओं, न्यायालयीन कार्यप्रणाली, पेशेवर नैतिकता तथा दैनिक वकालत के दौरान आने वाली चुनौतियों के विभिन्न पहलुओं से अवगत कराया गया।

समापन समारोह में माननीय न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उनके साथ प्रो. (डॉ.) अशोक आर. पाटिल, कुलपति, एनयूएसआरएल रांची; प्रो. (डॉ.) धर्मेंद्र कुमार, कुलसचिव, एनयूएसआरएल रांची तथा सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रदीप कुमार मैत्रा भी उपस्थित रहे।

समारोह का एक महत्वपूर्ण आकर्षण माननीय न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद का संबोधन रहा। उन्होंने युवा अधिवक्ताओं को निःशुल्क विधिक सेवाओं (Pro Bono Legal Services) के प्रति उनकी सामाजिक एवं पेशेवर जिम्मेदारी का बोध कराने के उद्देश्य से उन्हें प्रो बोनो विधिक सेवाओं की शपथ दिलाई तथा न्याय को समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक सुलभ बनाने के लिए प्रेरित किया।

विधिक पेशे में निरंतर सीखने के महत्व पर प्रकाश डालते हुए न्यायमूर्ति प्रसाद ने कहा कि विधिक शिक्षा कभी समाप्त नहीं होती, बल्कि यह व्यक्ति की संपूर्ण पेशेवर यात्रा के दौरान जारी रहती है। देवघर में सिविल अधिवक्ता के रूप में अपने अनुभव तथा बाद में झारखंड न्यायिक अकादमी से जुड़ाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने साझा किया कि न्यायिक अधिकारियों को पढ़ाने और उनके साथ संवाद करने से उन्हें स्वयं भी सीखने के अनेक अवसर प्राप्त हुए। उन्होंने कहा, “जिस दिन आप स्वयं को शिक्षित मान लेते हैं, वह आपके विकास का अंतिम दिन होता है।” उन्होंने प्रतिभागियों को प्रेरित किया कि वे इस कार्यक्रम के समापन को अपनी सीखने की यात्रा का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत मानें।

युवा अधिवक्ताओं को व्यावहारिक मार्गदर्शन देते हुए न्यायमूर्ति प्रसाद ने आर्थिक लाभ की अपेक्षा धैर्य, संवेदनशीलता और समर्पण को अधिक महत्व देने पर जोर दिया। एक प्रसंग साझा करते हुए उन्होंने अस्वीकृति को स्वीकार करने तथा प्रत्येक ‘नहीं’ को सीखने और आगे बढ़ने के अवसर के रूप में देखने की आवश्यकता बताई। उन्होंने युवा अधिवक्ताओं को अपने मामलों के ब्रीफ का गहन अध्ययन करने, तथ्यों के प्रत्येक पहलू की जांच करने तथा प्रत्येक मामले को पूरी ईमानदारी और गंभीरता से लेने की सलाह दी। साथ ही, उन्होंने प्रतिभागियों को संसाधन व्यक्तियों के साथ सक्रिय संवाद करने, प्रश्न पूछने तथा कार्यक्रम के संवादात्मक सत्रों का अधिकतम लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित किया।

न्यायमूर्ति प्रसाद ने इस अभिनव पहल की परिकल्पना एवं आयोजन के लिए पूरी टीम को बधाई दी तथा एनयूएसआरएल रांची के साथ अपने दीर्घकालिक संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने विश्वविद्यालय को संथाल परगना क्षेत्र तक अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए भी प्रोत्साहित किया और उस क्षेत्र में मौजूद चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया।

एनयूएसआरएल रांची के सहायक प्राध्यापक डॉ. कौशिक बागची ने युवा अधिवक्ताओं के लिए सतत विधिक शिक्षा के महत्व तथा समाज के प्रति उनके योगदान की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रोजेक्ट JAI के एक अन्य महत्वपूर्ण घटक, अर्थात विचाराधीन बंदियों को विधिक सहायता एवं प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराने की पहल पर भी चर्चा की। इस प्रकार उन्होंने न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के प्रति परियोजना की व्यापक प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।

समापन समारोह के दौरान बैच-I के प्रतिभागियों को अपने अनुभव साझा करने तथा कार्यक्रम से अपने पेशेवर विकास पर पड़े प्रभावों को व्यक्त करने का अवसर भी मिला।

प्रतिभागी आदित्य बनर्जी ने आयोजन टीम के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस कार्यक्रम ने उनकी अपेक्षाओं से कहीं अधिक उन्हें सीखने का अवसर प्रदान किया। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के माध्यम से उन्हें विधि के विभिन्न क्षेत्रों, वकालत के व्यावहारिक पहलुओं तथा सार्थक अकादमिक चर्चाओं से जुड़ने का अवसर मिला। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इन सत्रों ने प्रतिभागियों को Bare Acts का पुनः अध्ययन करने, अकादमिक जिज्ञासा विकसित करने तथा विभिन्न जिलों के विधिक पेशेवरों के साथ संवाद स्थापित करने के लिए प्रेरित किया।

चतरा के अधिवक्ता प्रिंस कुमार सोनी ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि प्रारंभ में वे इस कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर कुछ हिचकिचा रहे थे, लेकिन इस अनुभव ने विधिक अभ्यास के प्रति उनकी समझ को व्यापक बनाया तथा उन्हें प्रो बोनो विधिक कार्य करने के लिए प्रेरित किया।

समारोह के दौरान बैच-I के प्रतिभागियों को कार्यक्रम में सफलतापूर्वक सहभागिता के लिए प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर प्रोजेक्ट JAI के अंतर्गत सतत विधिक शिक्षा कार्यक्रम (CLE) के बैच-II (प्रथम चरण) का औपचारिक उद्घाटन भी किया गया। यह चरण 30 अक्टूबर से 1 नवंबर 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। इस नए बैच का शुभारंभ झारखंड के युवा अधिवक्ताओं की पेशेवर क्षमता को सुदृढ़ करने की दिशा में विश्वविद्यालय के निरंतर प्रयासों का प्रतीक है। इसके माध्यम से युवा विधिक पेशेवरों को व्यावहारिक विधिक ज्ञान, वकालत संबंधी कौशल तथा न्याय तक पहुंच के विभिन्न पहलुओं की बेहतर समझ विकसित करने का अवसर प्रदान किया जा रहा है।

अपने समापन संबोधन में डॉ. श्रेमांशु दाश, प्रोजेक्ट JAI के प्रोजेक्ट हेड एवं एनयूएसआरएल रांची के संकाय सदस्य ने न्याय तक पहुंच को वास्तविकता में परिवर्तित करने के परियोजना के उद्देश्य को पुनः रेखांकित किया। उन्होंने आशा व्यक्त की कि कार्यक्रम के दौरान प्राप्त ज्ञान एवं व्यावहारिक अनुभव प्रतिभागियों के साथ उनकी संपूर्ण पेशेवर यात्रा में बने रहेंगे और उनका मार्गदर्शन करते रहेंगे।

कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ, जिसके पश्चात दोनों बैचों के प्रतिभागियों के साथ सामूहिक छायाचित्र लिया गया। यह कार्यक्रम के सफल समापन तथा CLE पहल के अगले चरण की शुरुआत का प्रतीक रहा।

प्रोजेक्ट JAI के माध्यम से एनयूएसआरएल रांची सुलभ विधिक शिक्षा, पेशेवर विकास एवं न्याय तक पहुंच को सुदृढ़ करने के अपने संकल्प को निरंतर आगे बढ़ा रहा है। इस पहल का व्यापक उद्देश्य झारखंड में एक सक्षम, संवेदनशील एवं सामाजिक रूप से उत्तरदायी विधिक समुदाय का निर्माण करना है।

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