मिशनरी गतिविधियों और आदिवासी-जनजातीय समाज में धर्मांतरण के इतिहास पर केंद्रित दो पुस्तकों का राँची में लोकार्पण
राँची: झारखंड के आदिवासी एवं जनजातीय समाज में ईसाई मिशनरी गतिविधियों, धर्मांतरण के इतिहास तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के बीच लेखक सुनील कुमार बरनवाल द्वारा लिखित दो पुस्तकों ‘फादर कॉन्स्टेंट लिवेंस’ एवं ‘फादर कामिल बुल्के’ का लोकार्पण रविवार को राँची के हरमू हाउसिंग कॉलोनी में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का आयोजन शैलांचल प्रकाशन के तत्वावधान में किया गया।
समारोह की अध्यक्षता भारतीय महिला दार्शनिक परिषद की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राजकुमारी सिन्हा ने की, जबकि प्रख्यात लेखक एवं इतिहासकार डॉ. दिवाकर मिंज मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
धर्मांतरण के ऐतिहासिक पहलुओं पर डॉ. दिवाकर मिंज ने रखे विचार
कार्यक्रम में डॉ. दिवाकर मिंज ने धर्मांतरण के विषय पर खुलकर अपने विचार रखे। दोनों पुस्तकों के संदर्भ में ईसाई मिशनरी गतिविधियों, आदिवासी एवं जनजातीय समाज के बीच उनके विस्तार तथा धर्मांतरण से जुड़े ऐतिहासिक और सामाजिक पहलुओं पर चर्चा हुई। इस विमर्श ने झारखंड के आदिवासी-जनजातीय समाज में आए धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तनों को समझने के लिए इतिहास के विभिन्न पक्षों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
‘आदिवासी भारतीय ज्ञान और संस्कृति के संरक्षक हैं’ — डॉ. राजकुमारी सिन्हा
समारोह की अध्यक्षता करते हुए डॉ. राजकुमारी सिन्हा ने कहा कि आदिवासी समाज भारतीय ज्ञान-परंपरा और संस्कृति का महत्वपूर्ण संरक्षक है। उन्होंने आदिवासी एवं जनजातीय समुदायों की पितृ-परंपरा और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का उल्लेख करते हुए कहा कि वे प्रतिदिन अपने पितरों का स्मरण और पूजन करते हैं। यह परंपरा उनके जीवन-मूल्यों, सांस्कृतिक निरंतरता और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भावना को दर्शाती है।
उन्होंने आदिवासी-जनजातीय समाज की पारंपरिक मान्यताओं, सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को समझने तथा उनके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।
आदिवासी-जनजातीय इतिहास के विविध पक्षों पर संवाद की आवश्यकता
फादर कॉन्स्टेंट लिवेंस और फादर कामिल बुल्के के जीवन एवं कार्यों के संदर्भ में आयोजित इस कार्यक्रम में मिशनरी गतिविधियों, शिक्षा, भाषा, धर्मांतरण तथा आदिवासी-जनजातीय समाज पर उनके प्रभावों से जुड़े प्रश्न चर्चा के केंद्र में रहे। वक्ताओं के विचारों ने इस आवश्यकता को रेखांकित किया कि झारखंड के सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक इतिहास का अध्ययन ऐतिहासिक स्रोतों, स्थानीय परंपराओं और विभिन्न दृष्टिकोणों के आधार पर किया जाए।
कार्यक्रम में साहित्य, इतिहास, भारतीय संस्कृति और सामाजिक विषयों में रुचि रखने वाले लोगों ने सहभागिता की। दोनों पुस्तकों का लोकार्पण झारखंड के इतिहास तथा आदिवासी-जनजातीय समाज से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श का अवसर बना।
पुस्तकें:
1. ‘फादर कॉन्स्टेंट लिवेंस’
2. ‘फादर कामिल बुल्के’
लेखक: सुनील कुमार बरनवाल
प्रकाशक: शैलांचल प्रकाशन, रांची
