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भ्रष्टाचार के खिलाफ असली और नकली आरटीआई कार्यकर्ताओं की जंग: जानिए कौन है देश का सच्चा सिपाही और कौन कर रहा है ब्लैकमेलिंग

सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम 2005 भारतीय लोकतंत्र का एक ऐसा अचूक हथियार है, जिसने आम नागरिक को सरकार से सवाल पूछने की ताकत दी। इस कानून की बदौलत देश के बड़े-बड़े घोटालों का पर्दाफाश हुआ और सरकारी विभागों में पारदर्शिता आई। लेकिन बीते कुछ सालों में इस पवित्र कानून की आड़ में एक ऐसा नेक्सस (Nexus) तैयार हो गया है, जिसने आरटीआई को जनहित के बजाय ‘निजी स्वार्थ’ का जरिया बना लिया है।

आज समाज में दो तरह के चेहरे सामने आ रहे हैं—एक वो जो देश और समाज की भलाई के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं, और दूसरे वो जो आरटीआई को उगाही (Extortion) का धंधा बना चुके हैं।

असली आरटीआई कार्यकर्ता

व्यवस्था सुधार की मुहिम एक सच्चा आरटीआई कार्यकर्ता समाज का वो सजग प्रहरी है जो बिना किसी निजी लाभ के काम करता है। इनका मुख्य उद्देश्य सरकारी फंड के दुरुपयोग को रोकना, विकास कार्यों में हो रही धांधली को उजागर करना और आम जनता के अधिकारों की रक्षा करना होता है। चाहे राशन वितरण प्रणाली (PDS) में सुधार हो, अवैध खनन माफियाओं के खिलाफ आवाज उठानी हो, या सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता लानी हो—ये कार्यकर्ता बिना डरे सिस्टम से लोहा लेते हैं। कई मामलों में तो इन्हें अपनी जान तक गंवानी पड़ी है, लेकिन इनका मकसद हमेशा देशहित और जनहित ही रहता है। ये सूचनाएं जुटाकर कोर्ट में जनहित याचिकाएं (PIL) दायर करते हैं और दोषियों को सजा दिलाते हैं।

नकली आरटीआई कार्यकर्ता:ब्लैकमेलिंग और उगाही का नया चेहरा

इसके विपरीत, एक ऐसा वर्ग भी पैदा हो गया है जिसे प्रशासन और अदालतों ने ‘पेशेवर ब्लैकमेलर’ की संज्ञा दी है। ये लोग आरटीआई कानून का इस्तेमाल किसी जनहित के लिए नहीं, बल्कि निजी दुश्मनी निकालने या अधिकारियों और ठेकेदारों को डराने के लिए करते हैं। इनका काम करने का तरीका बेहद शातिर होता है। ये स्थानीय स्तर पर हो रहे छोटे-मोटे निर्माण कार्यों, अवैध निर्माणों या अधिकारियों की संपत्तियों की जानकारियां निकालते हैं। जैसे ही इन्हें कोई तकनीकी कमी या खामी मिलती है, ये संबंधित व्यक्ति पर दबाव बनाना शुरू कर देते हैं। इनका अंतिम लक्ष्य सूचना को सार्वजनिक करना नहीं, बल्कि ‘टेबल के नीचे से’ सौदा करना होता है। पैसा मिलते ही इनकी आरटीआई और शिकायतें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं।सिस्टम पर बढ़ता बोझ और छवि को नुकसानइन नकली कार्यकर्ताओं की वजह से सरकारी विभागों का कामकाज भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। ये एक ही विषय पर सैकड़ों निरर्थक अर्जियां लगा देते हैं, जिससे लोक सूचना अधिकारियों (PIO) का कीमती समय वास्तविक काम के बजाय सिर्फ इनके जवाब तैयार करने में बर्बाद होता है। सबसे बड़ा नुकसान उन सच्चे कार्यकर्ताओं को होता है जिनकी साख पर इन ब्लैकमेलर्स की वजह से आंच आती है।

अधिकारी हर आरटीआई आवेदक को शक की निगाह से देखने लगते हैं, जिससे जायज और जरूरी सूचनाएं मिलने में भी देरी होने लगती है। सच्चे और झूठे की पहचान है जरूरीलोकतंत्र की इस ताकत को बचाए रखने के लिए प्रशासन और आम जनता दोनों को सतर्क रहना होगा। सच्चा कार्यकर्ता हमेशा पारदर्शी होता है, वह मिली हुई जानकारी को मीडिया या जनता के बीच लाता है ताकि सुधार हो सके। वहीं, नकली कार्यकर्ता गुप्त बैठकें करता है और समझौता होने पर पीछे हट जाता है। समय आ गया है कि आरटीआई के दुरुपयोग को रोकने के लिए कड़े कानूनी कदम उठाए जाएं और ब्लैकमेलिंग करने वालों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाए, ताकि इस ऐतिहासिक कानून की पवित्रता और विश्वसनीयता बरकरार रहे।

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