रांची: राज्यसभा चुनाव की तारीखें नजदीक आते ही झारखंड के सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवाणी और कांग्रेस प्रत्याशी दोनों ने ही जीत हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। रांची से लेकर दिल्ली तक रणनीतियों का दौर जारी है। दोनों ही खेमे अपनी-अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं।
नथवाणी के ‘विकास कार्य’ बनाम कांग्रेस की ‘संगठन शक्ति’
एक तरफ परिमल नथवाणी अपने पिछले कार्यकाल में किए गए विकास कार्यों और उद्योग जगत में अपने गहरे संपर्कों के दम पर विधायकों को साधने में जुटे हैं। उनके समर्थकों का दावा है कि राज्य के बुनियादी ढांचे और रोजगार के क्षेत्र में नथवाणी का योगदान अतुलनीय रहा है। यही वजह है कि वे कई निर्दलीय और छोटे दलों के विधायकों की पहली पसंद बने हुए हैं।
दूसरी ओर, कांग्रेस उम्मीदवार अपनी जमीन मजबूत करने के लिए जमीनी स्तर पर एक्सरसाइज कर रहे हैं। कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखने और क्रॉस-वोटिंग से बचाने के लिए लगातार बैठकें कर रही है। कांग्रेस प्रत्याशी पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक और प्रतिबद्ध विधायकों के भरोसे अपनी नैया पार लगाने की कोशिश में हैं।
‘मनी पॉलिटिक्स’ और दलबदल की आशंका
इस चुनाव में विपक्ष लगातार सत्तारूढ़ भाजपा पर ‘मनी पॉलिटिक्स’ यानी धनबल की राजनीति का आरोप लगा रहा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भाजपा साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाकर लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। विपक्ष का आरोप है कि विधायकों को लुभाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रलोभन दिए जा रहे हैं, ताकि ऐन वक्त पर क्रॉस-वोटिंग कराई जा सके।
हालांकि, भाजपा और नथवाणी खेमे ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि यह केवल कांग्रेस की अपनी कमजोरी को छिपाने की हताशा है। अब देखना यह होगा कि इस सियासी बिसात पर ऊंट किस करवट बैठता है।