रांची में आयोजित संगोष्ठी में आदिवासी समाज ने परिसीमन के खिलाफ बिगुल फूंका; जून और अगस्त 2026 में बड़े आंदोलनों की घोषणा
रांची (झारखंड): वर्ष 2026 के बाद प्रस्तावित लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन को लेकर झारखंड के आदिवासी समुदाय में चिंताएं गहरा गई हैं। इस मुद्दे पर रांची प्रेस क्लब सभागार में “आदिवासी समाज पर परिसीमन का प्रभाव और संभावित समाधान” विषय पर एक महत्वपूर्ण सेमिनार और परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में राज्यभर के सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों, वकीलों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
राजनैतिक प्रतिनिधित्व पर आंच नहीं आने देंगे: बंधु तिर्की
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता, पूर्व मंत्री और झारखंड सरकार की समन्वय समिति के सदस्य बंधु तिर्की ने दोटूक शब्दों में कहा कि झारखंड में परिसीमन के कारण आदिवासी समाज पर कोई भी नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ने दिया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि परिसीमन के जरिए अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए आरक्षित सीटों को कम करने का प्रयास किया गया, तो इसका पुरजोर लोकतांत्रिक विरोध होगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सहित सभी धर्मनिरपेक्ष दल और संविधान में विश्वास रखने वाले लोग ऐसे किसी भी प्रयास को सिरे से खारिज करेंगे।
केवल जनसंख्या को आधार बनाने का विरोध
परिचर्चा में वक्ताओं ने जोर दिया कि परिसीमन केवल चुनावी सीमाओं को फिर से तय करने की प्रक्रिया नहीं है। झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में यह सीधे तौर पर पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों के संरक्षण, संवैधानिक अधिकारों और आदिवासियों की राजनीतिक भागीदारी से जुड़ा है। वक्ताओं ने आगाह किया कि यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आंकड़ों पर आधारित हुआ, तो आदिवासी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व घट जाएगा, क्योंकि खनन, विस्थापन, पलायन और धीमी जनसंख्या वृद्धि दर के कारण इन क्षेत्रों की आबादी के आंकड़े प्रभावित हुए हैं। इसके विपरीत, शहरी और गैर-आदिवासी क्षेत्रों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है।
2002 के परिसीमन और 2008 के संशोधन का हवाला
सेमिनार में याद दिलाया गया कि 2002 के परिसीमन आयोग ने 2001 की जनगणना के आधार पर झारखंड में ST विधानसभा सीटों को 28 से घटाकर 22 और लोकसभा सीटों को 5 से घटाकर 4 करने का प्रस्ताव दिया था। तब पूरे राज्य में हुए जनआंदोलन के आगे झुकते हुए केंद्र सरकार ने 2008 में परिसीमन अधिनियम में संशोधन कर झारखंड की सीटों की स्थिति को वर्ष 2026 तक के लिए ‘यथास्थिति’ (Status Quo) में रख दिया था।
भावी रणनीति के लिए बनीं समितियां और आंदोलन की तारीखें तय
आदिवासी समाज ने आगामी परिसीमन को देखते हुए अपनी मांगों को पुरजोर तरीके से उठाने के लिए कई बड़े फैसले लिए हैं:
* 17 जून 2026: रांची में सभी राजनीतिक दलों की एक विशेष बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें आदिवासियों की चिंताओं को प्रमुखता से रखा जाएगा।
* 2 अगस्त 2026: परिसीमन के विरोध में एकजुटता दिखाने के लिए रांची में एक विशाल “आदिवासी एकता महाजुटान रैली” का आयोजन किया जाएगा। इस रैली की तैयारी के लिए ग्लैडसन डुंगडुंग, शशि पन्ना और अनिल अमिताभ पन्ना की समिति बनाई गई है।
* रणनीति और मसौदा समितियां: दीर्घकालिक और अल्पकालिक रणनीतियों के लिए दयामणि बारला और वासवी कीडो की दो सदस्यीय समिति का गठन किया गया है। वहीं, एक ड्राफ्टिंग कमेटी लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष और अन्य संवैधानिक मंचों के सामने प्रस्तुति के लिए एक व्यापक रिपोर्ट तैयार करेगी।
* दिल्ली में राष्ट्रीय बैठक: लोहरदगा सांसद सुखदेव भगत और खूंटी सांसद कालीचरण मुंडा को दिल्ली में परिसीमन के संबंध में एक व्यापक बैठक आयोजित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
प्रमुख मांगें:
1. झारखंड में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित विधानसभा (28) और लोकसभा (5) सीटों में कोई कटौती मंजूर नहीं की जाएगी।
2. यदि भविष्य में कुल सीटें बढ़ती हैं, तो ST सीटों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ाई जाए।
3. परिसीमन करते समय पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों की भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अखंडता को अक्षुण्ण रखा जाए।
4. परिसीमन प्रक्रिया की समीक्षा के लिए संवैधानिक विशेषज्ञों, आदिवासी मामलों के जानकारों, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) के प्रतिनिधियों, सांसदों और विधायकों को मिलाकर एक उच्च स्तरीय राष्ट्रीय समिति बने।
इस आयोजन में पूर्व मेयर रमा खलखो, अधिवक्ता सुभाशीष सोरेन, प्रो. रामचंद्र उरांव, संदीप उरांव, प्रेमचंद मुर्मू सहित कई प्रमुख आदिवासी और सामाजिक चिंतक उपस्थित रहे।